देश

23 मई – विश्व कछुआ दिवस के अवसर पर विशेष लेख

कछुए के बिना हिंदी साहित्य

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार

चरवाणीः 73 8657 8657, Email: jaijaihindi@gmail.com

हिंदी में जब बात चाल की हो और कछुए की बात न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। लड़की की सुंदर चाल के लिए हिरणी जैसी चाल, भारी भरकम लोगों की चाल को हाथी की चाल कहना यह सब आम मुहावरे हैं। हिरणी जैसी चाल मन मोह सकती है, हाथी जैसी चाल अपने भारी भरकम शरीर से बोझ का आभास करा सकती है। लेकिन कछुए की चाल अपनी धीमी गति से कुछ करे न करे जीत जरूर दिला सकती है। आज भी आलसी और अति आत्मविश्वासी लोग खरगोश की तरह सोते दिखायी देते हैं। निरंतर परिश्रमी, समय का मोल जानने वाले कछुए की भांति धीमी चाल से ही सही ‘शार्टकर्ट’ से नहीं ‘स्टेडी वॉक’ से हर बाजी जीत जाता है। कछुआ कुछ जाने न जाने लेकिन जीत के मायने जानता है। इसने हिंदी मुहावरे के बहाने जीतने का एक ऐसा चमत्कारी मंत्र फूँक दिया है, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते।

कछुआ शब्द ‘कच्छप’ से बना है। शब्द विश्लेषण करने पर इसका रूप कक्ष + कः + प दिखायी देता है। इसका अर्थ है- कक्ष में रहने वाला। यह एक मजबूत कवच के भीतर स्वयं को सुरक्षित रखता है। यह ऊपर से जितना मजबूत, ठोस, दृढ़ दिखायी देता है, भीतर से उतना ही कोमल और मृदु स्वभावी होता है। यही कारण है कि जब भी विकट स्थिति आती है तब वह अपने अंगों को कवच के भीतर छिपा लेता है। इससे चोट लगने का भय समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि कछुआ धरती पर सबसे अधिक आयु तक जीने वाला प्राणी है। हमारे महान साहित्यकार फिर चाहे वे कबीर, जायसी, तुलसी, सूर आदि हों, वे सभी कछुए के स्वभाव वाले थे। ऊपर से गंभीर और भीतर से कोमल। उन्होंने भी कछुए की भांति सभी तरह की चोटें खायीं, किंतु बदले में उन्होंने अपने कोमल उच्च विचारों से समाज का मार्गदर्शन किया। जहाँ तक दीर्घायु की बात है तो वे कछुए की तुलना में अधिक दीर्घायु हैं। कछुआ मात्र औसतन डेढ़ सौ वर्षों तक जीवित रह सकता है, जबकि कबीर, जायसी, तुलसी, सूर सैकड़ों वर्ष बीत जाने पर भी हमारे बीच जीवित हैं।

आज हिंदी को विश्वभाषा बनाने में बॉलीवुड का बहुत बड़ा हाथ है। और बॉलीवुड को बनाने में कछुए का हाथ! अब आप यह सोच रहे होंगे कि कछुए का बॉलीवुड के साथ क्या संबंध है? तो इस संबंध का पता लगाने के लिए कछुआ के पर्यायवाची शब्दों की जाँच-पड़ताल करनी होगी। हिंदी में इसके लिए कच्छू, कछऊँ, काछिन और कश्यप आदि शब्द प्रचलित हैं। अतीत में कश्यप नाम के ऋषि-मुनि हुए हैं। वे स्वयं को कछुए का उपजा अंश मानते थे। उन्हीं के वंश परंपरा में आगे चलकर हुए- अनुराग कश्यप। अब भला अनुराग कश्यप को कौन नहीं जानता। उन्होंने हिंदी सिनेमा में हिंदी बोलियों के नाम पर जितने प्रयोग किए हैं, शायद ही किसी ने किया होगा। चार-चार अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित कश्यप ने ब्लैक फ्राइडे, डेव डी, गुलाल, मुंबई कटिंग, गैंग्स ऑफ वसीपुर, बॉम्बे टॉकीस, अग्ली, बॉम्बे वेलवेट, रामन राघव 2.0, मुक्काबाज़, लस्ट स्टोरीस, सैकर्ड गेम्स, मनमर्जियाँ, घोस्ट स्टोरीज़ जैसी एक से एक बढ़कर सिनेमा और वेब सीरीज़ की झड़ी लगा दी। इनकी फिल्मों के कुछ संवाद जैसे- दिल्ली में बिल्ली मार लो, खा लो, लेकिन पालो नहीं (देव डी), बाप का, भाई का सबका बदला लेगा फैजल (गैंग्स ऑफ वसीपुर), बेटा तुमसे न हो पायेगा (गैंग्स ऑफ वसीपुर), हम अभी तक जिंदा है, क्योंकि सिनेमा नहीं देखते (गैंग्स ऑफ वसीपुर), इस मुल्क ने हर शख्स को जो काम था सौंपा, उस शख्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी (गुलाल), खुदी को कर बुलंद इतना, कि तू हिमालय पे जा पहुँचे, खुदा खुद तुझ से ये पूछे, अबे अब तू उतरेगा कैसे (गुलाल) आदि को भला कौन भूल सकता है। हाँ यह अलग बात है कि हिंदी साहित्य की पैठ रखने वाले इसे साहित्य ही नहीं मानते। किंतु सच्चाई यह है कि हिंदी साहित्यकारों की सृजनशीलता ने हिंदी को जो बुलंदी दिलायी है उससे थोड़ा कम ही सही हिंदी सिनेमा ने भी अपना योगदान दिया है।

अब बताइए क्या कछुए के बिना हिंदी साहित्य की कल्पना की जा सकती है?        

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