लेख

देहातों की परेशानियां व मूलभूतअसुविधाएँ…?”

      *दिनेश गंगराड़े,

इंदौर, दि.19-5-2020

प्रदेश में अनुमानतः 70 से 73 फीसदी जनता कुल 54 हजार गांवों में निवास करती है।याने 72 फीसदी गावो से हमारा प्रदेश बना है।स्वच्छ्ता अभियान के चलते भी हमारे देहातों में गंदगी व्याप्त है।हर गावँ गंदगी के पर्याय है।गावो में प्रवेश करते ही कम्पोस्ट खाद के गड्ढों से आपका सामना होगा,लगभग 60से 70 प्रतिशत गंदगी इन खाद के गड्ढों व नालियों तथा घूडो के कारण पाई जाती है,जोकि 80-90फीसदी मच्छरों को जन्मती है।गांवों में शादी,नुक्ता,मान,गौना इत्यादि कार्यक्रमो में पत्तल-दोना,झूठन व पानी की बर्बादी से भी खासी गंदगी फैलती है।इन कूड़ा-कचरों का ,मवेशियों का निराव-पुलाव,बच्चों के शौच,पशुओं के मल-मूत्र/गोबर से भी वर्षभर गन्दगी व्याप्त रहती है।गांव की नालियो की नियमित सफाई न होना,मौजूद कूड़ा-करकट का व्यवस्थित निपटान न होने से अस्वच्छता सालभर पसरी रहती है।इधर जंगलों में गिध्दों,बाजों की  प्रजाति विलुप्त व नष्ट होने से मृत मवेशियों की सड़ांध गंदगी में और इजाफा करती है।नियमित साफ-सफाई के अभाव में रोग फैलते है।गर्मियो में सड़े-गले फल,तरबूज़,खरबूज,कुल्फी वगेरह खाने से तथा मक्खियों से रोगिले कीटाणु।तेज़ी से बढते है,जो रोग फैलाते है।शहरों में न बिकनेवाली सड़ी-गली वस्तुएँ गांवों में सस्ते दरो पर खपा दी जातीहै।जो बीमारी की वजह बनती है।फ़िलहाल बढते वाहनों से ,जो कि फ़िलहाल प्रदेश में मोटे तौर पर 50 लाख के आसपास है,गांवों में भी वायु प्रदुषण फैल रहा है।कचरा-नरवाई थोक में जलाने से तथा अंदाज़न25 से 30 फीसदी पहाड़ी गावो,जंगलो के व्यापक वृक्ष कटने से अब देहातों की आवो-हवा शुध्द नहीं रही हे?लॉक डाउन के कारण अभी तो प्रदूषण नगण्य है एवं कार्बन उत्सर्जन भी गिरे हुए प्रतिशत में है।प्रान्त के 55 हजार गांवों में से करीबन 44 हजार गांवों में शमशान शेड व अंत्येष्टि स्थल विकसित कर बनाएं गए है जिससे दाहकर्म करने में राहत मिली है,परंतु शमशान पहुँच मार्ग कच्चे,गड्डेदार होने से बारिश में तकलीफदेह स्थिति निर्मित होती है।पंच परमेश्वर योजना मद् से गांवों में 95 प्रतिशत कांक्रीट रोड बन जाने से हमारे गांव कीचड़ से ,आज़ादी के 73 वर्ष बाद मुक्त हुए है।औसतन 1150 फीट कांक्रीट सड़क हर गांव में निर्मित हुई है।सरकार के आँकड़ें उगलते है कि लगभग 54 हज़ार गांवों में 18 हज़ार किलोमीटर कांक्रीट सडकों का जाल।बिछाया गया है,जिससे 77करोड़ 54लाख 40 हजार वर्गफीट क्षेत्रफल पर कांक्रीट कार्य होने से कीचड़ से तो मुक्ति मिली है परंन्तु लगभग 78 करोड़ वर्गफीट एरिये में धरती की  जल शोषण क्षमता कम हुई हैफलतः मालवा व निमाड़ का जल स्तर नीचे सरक गया है।कांक्रीट की सतह गांवों में बढ़ने से देहातों का तापमान बढ़ गयाहै।अल्प वर्षा तथा साढे 15 हज़ार नल-जल योजनाओ ने (नलकुपो) व लाखो ट्यूबवेलों ने प्रदेश का जलस्तर 350 से 400 फीट तक नीचे  गिराया है।4-5माह की कीचड़ से मुक्ति 8 माहो की गर्मी बढा रही है। चालू-मालू साल में पर्याप्त बरसात से इस वर्ष फरवरी-मार्च से ही भीषण जलकष्ट दस्तक नही देने वाला है।अमूमन 30से40प्रतिशत देहातों में  हर साल भारी जलसंकट रहता है? पृथ्वी की जल  शोषण क्षमता बढाने के लिए लाखो की संख्या में सोख्ता गड्ढों को खोदा जाएं,कूपों के पास “रिचार्ज पिट ,नलकूपों के पास रिचार्ज सिस्टम अनिवार्य रूप से बनाये जावे । छत का पानी वाटर रीचार्ज जिंग प्रणाली से ज़मीन के नीचे उतारना बेहद ज़रूरी है।गावो की मुलभुत असुविधाओं में मोबाईल टावरों की बदती संख्या एक सिरदर्द है,जिसे हम सुविधा मान रहे है वे ही  हजारोंमोबाईल टावर भारी मात्रा में रेडिएशन फैलाकर केंसर रोग को ज़्यादा बढावा दे रहे है।अमूमन हर गांव में 10से 15।जानलेवा केंसर रोगी पाये जा रहे है,जिससे मृत्युदर तेज़ी से बढ़ रही हैऔर सेकडों परिवार इसके उपचार से गरीब हो रहे है।”नेट”की अश्लीलता से भी हमारे देहात अब अछूते नहीं है,दुष्परिणाम स्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में दुष्कर्म की घटनाएँ बढ़ गई है।यूँ तो शासन ने हजारो की संख्या में सिचाई कूपों,वाटर शेडों के द्वारा प्रदेश का सिचाई रकबा 13 प्रतिशत बढ़ाया है जिससे सूबे की कुल सिचाई क्षमता 32.50लाख हेक्टर हुई है,परंतु ये जतन अन्नदाता किसान की नज़र में नाकाफी है वास्ते किसान दुखी है।वे हर खेत को सिंचित देखना चाहते है। किसानों ने अपने खेतों के आजू-बाजु के स्टॉप डेमो की गाद जो बेहद उपजाऊ काली मिटटी होती है अपने खेतों में डालना चाहिए।प्रधान मंत्री सड़क योजना में सूबे में 75 हजार क़ि.मी.पक्की सड़कें निर्मित हुई है।मोटे तौर पर 70से 80 परसेन्ट गांव तकरीबन जुड़े है पर फिर भी दूर-सुदूर के हजारो देहात सड़क विहीन है।वैसे इन्हे जोड़ने की कवायद जारी है।मतलब 1.50कि.मी./गांव पी एम जी एस    मद से डामर सड़कें मुहैय्या हुई है।कच्ची सडकों के मामले में 285 मीटर प्रति गांव के हिसाब से कुल 16 हजार कि.मी.लगभग चलने काबिल कच्ची मुरम मार्ग बने है या प्रगतिरत है याने सेकडों गांव अब भी सड़क विहीन है।मनरेगा मद से गांवों की तस्वीर बदली है पर ये अब भी नाकाफी है?प्रत्येक गांवों में बड़े तालाबो की योजना फलीभूत नहीं हो रही है,कही स्थान तो कही अतिक्रमण रोड़ा बन रहा है।ऊपर के पानी के तरस-तरस के बरसने से प्रान्त के खेतिहर मज़दूरो की समस्या उभर रही है?काम-धंधा के आभाव में साल के।कुछ माह श्रमिक पलायन कर आसपास के राज्यों में मज़दूरी करने चले जाते है।पाखानो के मामले में प्रदेश में 5 लाख शौचालय निर्मित हुए है जो 66 फीसदी गांवों को ही खुले से शौच मुक्त करवा पाएं है,तकरीबन  पौने 19 हज़ार गांव ,34 प्रतिशत अब भी टट्टीघरों के निर्माण की बाट जोह रहे है।पेयजल सुलभता अब भी खरी नहीं है।भीषण जानलेवा गर्मी में गावडेलो में पानी का खासा टोटा रहता है,कोरोना के जानलेवा आक्रमण से देश त्रस्त है इसलिए जल संकट पर चिल्ल-पौ नही मच रही है।खाद के गड्डे गांव से 3-4 कि.मी.दूर बनाने के सख्त नियम राज्य शासन ने बनाकर मुस्तैदी से लागु करना चाहिए।गटर-नालियो की सतत सफाई का कड़क कानून बने।अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा देहातों में अनिवार्य रूप से बढना ज़रूरी है।झाड़-फूंक,टोन-टोटके,अंध विश्वास ,सूदखोरी,उधारी,संकुचित्तता,अविश्वास से गांवों को मुक्त होना चाहिए।स्थानीय चुनावो में गांवों का माहौल ख़राब होता है।आपसी गुटबाज़ी,रंजिशें गांव की फ़िज़ां बिगाड़ते है ऐसी नासमझी रुकना चाहिए?सरकार का इतना ढोल पीटने के बाद भी प्रदेश की विकास दर 10.6प्रतिशत है जायज़ है गांवों का 89 फीसदी तरक्की होना अभी भी बाकी है।वैसे प्रदेश की 313 जनपदे और 22825 ग्राम पंचायतें गांवों के कायाकल्प हेतु जुटी है फिर भी देहातों में सुविधा कम ,असुविधाएँ,तकलीफें,दिक्कतें ज़्यादा है।सोलर एनजी से बिजली का उत्पादन घर-घर व खेतों पर होने से विधुत आपूर्ति में आत्मनिर्भरता बढ़ाना जरुरी है।सरकार के भरोसे रहने की बजाय ग्रामीण खुद सुविधाए बढ़ाये तो ही गांवों की ढेरो असुविधाएँ दूर होंगी?बरसाती पानी को ज़मीन के अंदर उतारने के देहाती फंडे लागू किए जाने चाहिए।छत के पानी को मकान के कोने पर कुआ नुमा गहरा टैंक बनाकर उसमें बरसाती पानी संग्रह करना,8-10माहों तक राहत कर रहेगा तथा पेयजल को छोड़ अन्य पानी के काम बेहद उपयोगी रहेगा।गांव में एक बड़ा तालाब ज़रूर होना ही चाहिए।पुराने कूपों का कचरा हटाकर उन्हें पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।कोरोना से बचने हेतु रास्ते तो रोके ही गए है,पर अब वक्त है कि हम गांव में किसी भी अपरिचित को प्रवेश देने से पहले उसकी समूची जानकारी लें,तसल्ली करें तभी उसे प्रवेश दें।शहरों से गांव में आने वाले स्थानीय लोगो का स्वास्थ्य परीक्षण करने के उपरांत ही उन्हें 14दिनों बाद घर में आने दें,तब तक उसे अपने खले में रोक कर भोजन का टिफिन ,डब्बा भेजते रहे।बहुत ज़रूरी हो तभी  गांव को कोई प्राणी बाहर निकलें।सतर्क,सावधान,सचेत रहने का वक्त है।फिलहाल कोरोना का अंत करना नितांत आवश्यक है।संसार भर में कोरोना 3लाख लोगों को लील चुका है।सावधान….?

प्रेषक–दिनेश गंगराडे,102/65,दीप पेलेस कालोनी,एस एस गार्डन, निपानिया, इंदौर452010मप्र

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *