साहित्य

लघु कथा

पश्चाताप के आँसू

‘देखो राहुल, कान खोलकर सुन लो। अगर तुमने अपने पिता जी को इस बार पैसे दिए तो इस घर में आज मेरा आखिरी दिन होगा। मैं तोे तंग आ चुकी हूं तुम्हारे पिता जी से। एक महीना होता नहीं है, मुंह उठा कर चल आते हैं। बड़ी मुश्किल से बूढे़-बुढ़िया से पीछा छुड़ा कर गांव से शहर आए थे। सोचा था यहां आकर तो तंग नहीं करेंगे। मगर………………’

‘तुम ठीक कहती हो पारूल । साल के दो महीने अप्रैल और मई तो पहाड़ जैसे लगते हैं। इन्हीं में बच्चों के स्कूल का दाखिला करवाना होता है। उनकी स्कूल की नई ड्रेस, नई किताबें और साथ ही खाने के लिए गेहूं की बोरियां भी खरीदनी होती है। इतनी महंगाई में बारह हजार रूपये महीना कमाने वाला कैसे घर खर्च चलाता है, यह तो मैं ही बेहतर तरीके से जानता हूं। तुम भी तो बीमार रहती हो, तुम्हारी दवा-दारू में भी कितना पैसा खर्च हो जाता है।’ राहुल पारूल की बात बीच में काटते हुए बोला।

‘मैं कुछ नहीं जानती। कैसे भी करके अपने पिता जी को टालमटोल करके वापस भेज देना। वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।’ पारूल ने तेवर बदलते हुए कहा।

‘ठीक है बाबा, जैसा तुम चाहोगी वैसा ही होगा। पहले पिता जी से मिल तो लूं। सौ किलोमीटर का सफर तय करके आए हैं। थक गए होंगे। बातों-बातों में उनकी मंशा भी जान लूंगा और कोई अच्छा सा बहाना बनाकर उन्हें पैसों के लिए टाल दूंगा।’ इतना कहकर राहुल अपने पिता जी के पास चला गया। उसने सबसे पहले अपने पिता जी के चरण-स्पर्श किए और अपनी मां तथा गांव का हाल-चाल पूछा।

उसके पिता जी ने अपनी जेब से पांच सौ के नोटों की गड्डी निकाल कर राहुल के हाथ में रख दी। वह बोला-‘बेटा, इस बार फसल अच्छी हुई है। फसल का दाम भी दुगुना था। सोचा, तुम यहां शहर में परेशानी में दिन बिता रहे होगे। बच्चों की पढ़ाई का खर्चा, बहू की दवा के लिए भी बहुत पैसे खर्च हो जाते हैं। हम तो गांव में दो ही जने हैं। हमें बुढ़ापे में किसी खास चीज की जरूरत नहीं है। बस तुम, बहू और बच्चे सुखी जीवन व्यतीत कर सको, यही सोचकर तुम्हें पैसे देने चला आया। इन्हें रख लो, तुम्हारे काम आएंगे।’ राहुल निरूत्तर अपने पिता को एकटक निहार रहा था। उसके पिता का एक-एक शब्द नस्तर की भांति चुभ रहा था। उसकी आंखें नम हो चुकी थी। उसकी पत्नी पारूल भी सब कुछ सुन रही थी। उसके नेत्र भी सजल हो चुके थे। दोनों अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे थे। दोनों उनके चरणों में गिर पड़े और उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे।  

विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’,

तोशाम, जिला भिवानी,

हरियाणा

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