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कोई लौटा दे मेरे, भंडारे वाले दिन

वे भी क्या दिन थे यानि लॉक डाऊन के पहले के, जब हमारे नगर में भंडारे आम थे । अपने देश के किसी सुदूर कोने में या महानगरों में रहने वालों को शायद भंडारा क्या होता है यह पता न हो, तो बता दें कि भंडारे को गली या मोहल्ला भोज कहा जा सकता है यानि यूं समझ लीजिये की किसी जमाने में होने वाले ग्राम भोज की तरह । भंडारे पर इष्ट देव के पूजन के बाद प्रसाद के रूप में गली – मोहल्ले वालों को भोजन दिया जाता है तथा भंडारे में जीमना हमारे नगर में शुभ माना जाता है ।

तो लॉक डाऊन के पहले, कभी इस गली के मंदिर में तो कभी उस गली में, कभी इस मोहल्ले में तो कभी उस कॉलनी में भंडारे होते ही रहते थे । इन भंडारों के पीछे भी हरेक का अपना अपना गणित होता था, कोई श्रद्धा-भक्ती से या अपने परिवार में आए किसी शुभ समाचार के बाद मन्नत पूरी करने के हिसाब से भंडारा करवाता था, तो कोई श्रद्धा-भक्ती से भंडारा चखना चाहता था । किसी को भंडारे के रूप में खालिस समाजसेवा करना होती थी तो किसी को सेव-नुक्ती-पूड़ी-भाजी खाने के लिये भंडारे का इंतजार रहता । कोई इसे ईश सेवा के रूप में देखता तो कोई जजमान से दक्षिणा के लिये तो कोई इन भंडारों में अपनी जेब गरम करना चाहता है क्योंकि भंडारे के लिये चंदा जमा करना भी आम था ।

अनलॉक होते हमारे नगर की हमारी गली में इसी भंडारे पर हो रहा विमर्श आज आपके सामने रखना चाहता हूँ तो हुआ यूं कि आज सुबे-सुबे मैं ओटले पर बैठ कर मंजन-कुल्ला कर रहा था कि पडौस से छोटे चुन्नू के किरकिराने की आवाज आई, “चाय-टोस नी खाऊंगा, मुझे पेड़ा खाना है, नी तो नुक्ती खानी है ।“ चुन्नू की माँ उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि “अभी मिठाई की दुकान बंद है, खुलेगी तो डैडी लायेंगे तेरे लिये ।“ चुन्नू फिर किरकिराया “मुझे अभी खानी है नुक्ती ।“ गये तीन महीनों से घर में बेगार बैठा चुन्नू का डैडी जो इस वक्त हमारी ही तरह अपने ओटले पर बैठ मंजन कर रहा था, गली की नाली में थूकते हुए तथा झींकते हुए धीरे से बोला, “अब मेरी तेरवी की नुक्ती खा लेना” लेकिन उधर चुन्नू को समझाते हुए उसकी माँ बोली “ कल भंडारा होगा तो चलेंगे जीमने, वहाँ सेव-नुक्ती मिलेगी ।“ चुन्नू थोड़ा मचला फिर बहल गया और शायद चाय-टोस्ट खाने में रम गया ।

मंजन कर हमने अपने हाथ, सिर के ऊपर बांधकर जोरदार अंगड़ाई ली, अपने पैरों को थोड़ा मोड़ा-माड़ा लेकिन उससे तन-मन पर छाई सुस्ती कम नी हुई, पिछले भंडारे पर खाया हुआ सेव-नुक्ती का खाना हमें भी याद आ गया ।

तभी चुन्नू के डैडी को गली के कोने पर बिरजू से बात कर रहे नेताजी पन्नू भिया दिख गये तो हमें आवाज देते हुए उन्होने ओटले से गली में छलांग लगाई और लगभग दौड़ते हुए गली के कोने पर पन्नू भिया के पास पहुँच गये और “भिया राम” कहते हुए तथा पन्नू भिया के घुटने को छूते हुए धोक लगाया । हम भी पन्नू भिया के पास पहुँचे व अपनी लेखकीय आदत के अनुसार दोनों हाथ जोड़ कर पन्नू भिया को नमस्कार कहा ।

चुन्नू के डैडी के सिर पर हाथ फेर कर पन्नू भिया ने आशिर्वाद दिया और बोले, “कैसा है रे, दिखता नी आजकल ? और आप कैसे हो माटसाब ?” नेताजी ने हमसे भी पूछा ।

    “मैं तो यहीं हूँ भिया, बस लोकडाऊन चल रिया था फिर चौराये पर पुलिस होन भी थी ।“ चुन्नू का डैडी बोला और हमने सिर्फ, “सब ठीक है नेताजी “ कहा ।

    “अब तो धीरे धीरे खतम ही हो रिया है लोकडाऊन, मैंने मुख्यमंत्रीजी से कल ही बात की थी कि अब ये लोकडाऊन को पूरा डाऊन कर दो, सर । क्या है कि अपने सारे अट्ठे-पट्ठे अब परेसान हो रिये है घर में बेठे बेठे । फिर भोत दिन से कोई रेली-वेली बी नी हुई, नि कोई सभा-अभा बी नि हुई तो छोरे-छारे करें तो क्या करें । करोना-करोना कित्ते दिन करें, कोई लिमिट नी लग रई ।“ पन्नू भिया ने लम्बी फैंकी जिस पर पास में खड़े सत्तू – बिरजू और चुन्नू के डैडी ने बड़े आदरभाव से सिर हिलाया मानो मुख्यमंत्री जी पन्नू भिया की हर बात मान कर ही प्रदेश का राजकाज चला रहे हों ।

“इस करोना की तो ऐसी की तेसी “ पप्पू धीरे से बोला जो पास में ही खड़ा था ।

अब चार छै अट्ठे-पट्ठे तथा हमारे जैसे फुरसतिये और इकट्ठे हो गए थे । इधर हमारा ये मजमा अपनी बातचीत में रमा हुआ था और उधर अपनी गैलेरी में जमे शर्मा जी पडौस की गैलेरी में जमे गुप्ता जी से बोल रहे थे कि “येई लोग करवायेंगे सत्यानास, देखो पहले भी राजवाड़े पर ताली बजाने पोच गये थे और करोना को फैला दिया अब फिर न जाने क्या खिचड़ी पका रहे हैं ।“ गुप्ता जी भी हाँ में हाँ मिलाते हुए बोले, “और नी तो क्या, मैंने देखा था इन सबो को राजबाड़े पे । फिर चाईना ने तो देश में करोना सिरफ भेजा था, फैलाया तो इन्ही लोगों ने ।“

“ नेताजी, ये करोना को हटाना है तो आपके हाथों एक हवन करवा लो मंदिर में और भंडारा भी रखवा लो गली में “ गली के मंदिर के पंडित जी अब मजमें में अपनी उपस्थिती दर्ज करवाते हुए बोले ।

“सच्ची, कित्ते दिन हो गये दशेरा मेदान पे कोई रेली बी नी हुई और गली में कोई भंडारा भी नी हुआ । कुछ करो भिया आप “ पन्नू भिया को चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए चुन्नू का डैडी बोला, उसे शायद नुक्ती मांगता चुन्नू और भंडारे की सेव-नुक्ती तथा पूड़ी-भाजी याद आ गई ।

    “रेली–वेली तो ठीक है भिया, लेकिन ये भंडारे होन की छूट तो मिलनी ही चिये “ संजू बोला  उसे भी पिछला भंडारा याद आ गया जब वह गली गली दो दिन ऑटो में घूमा था माईक पर, “भंडारा-भंडारा-भंडारा, विशाल भंडारा” चिल्लाते हुए और पन्नू भिया ने हजार रूपये इनाम दिया था उसे ।

    “हाँ भिया, अब मंदिर होन खोल रे हैं तो भंडारे की छूट भी तो मिलनी ही चिये ”  हमने भी सेव-नुक्ती याद करते हुए कहा ।

    इस बार बिरजू भी श्रद्धा से बोला, “हाँ भिया, भोत दिन से भंडारा नी हुआ गली में । धरम-करम नी होगा तो ये करोना की महामारी जायेगी कैसे ?“ भंडारे की बात सुन पन्नू भिया का चेहरा भी कुछ चमक उठा, शायद उन्हे भी भंडारे के रसीद कट्टे याद आ गये ।      “इस साल तो शादी-ब्या में ही पचास लोग मुस्किल से जीम रिये हैं तो भंडारा कां से होगा ?“ पास खड़े मुकेरी काका पाचर मारते हुए बोले ।

मुकेरी काका की सच्ची बात सुन हम सभी के चेहरे पर मुर्दनी सी छा गई । हमारे भीतर छिपे कवी ने तत्काल एक पुराने गीत की पैरोड़ी कुछ यूं बनाई तथा सुना के नेताजी पन्नू भिया से दाद भी पाई कि “कोई लौटा दे मेरे, भंडारे वाले दिन, रसीद कट्टे वाले, सेव-नुक्ती के दिन, कोई लौटा दे मेरे, भंडारे वाले दिन ” ।

 राजेन्द्र वामन काटदरे

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