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व्यंग्य

 चल पैसेवर, मजबूरी दुह

जबसे देश धरती पर कलियुग में कोरोनायुग का पदार्पण हुआ है, इस युग के आने से पहले जो लोग अपनी गिरती सजती दुकानों में जनता को बीस बीस दिन बासी ताजी जलेबियां, ताजे सड़े बेसन के लड्डू, कीड़ियों वाले गुड़पारे खिलाया करते थे , आज उन्होंने अपनी दुकानों के बाहर से हलवाई का फट्टा उतरवा पॉजिटिव होने से बची जनता को मरवाने कमाने के लिए कोरोना दवाशोध संस्थानों के बड़े बड़े बैनर लगा लिए हैं। आज उन्हें अपने स्वास्थ्य की कतई परवाह नहीं ,दिनरात बस लोक कल्याण! लोक कल्याण! लोक कल्याण! रेत मिट्टी जो हाथ लग रही है, पीसे जा रहे हैं ।

कोरोनाकालीन ऐसे परमार्थी कम घोर स्वार्थी मुहल्ले की सड़कों से लेकर महानगरों की सड़कों तक सोए सोए भी दावे कर रहे हैं कि उन्होंने कोरोना की शर्तिया दवा बना ली है। बस, कल विश्व के कल्याण के लिए बाजार में उतर रही है। विश्वबंधुता ,विश्वमानवता का ऐसा उफान तो सतयुग में भी क्या ही आया होगा? अब देश में तो क्या, पूरी धरती पर कोरोना से जैसे कैसे कोई खुद ही बच जाए तो बच जाए, पर इन उन जैसे नीम हकीमों की दवाई से किसी भी हालत में नहीं बच सकता। 

हर बार कमाने का एक खास समय होता है। जो पकड़ गया सो पकड़ गया। वर्ना बाद में आदर्शवादी हो पछताने के सिवाय और कुछ हाथ नहीं लगता। फिर मलते रहो हाथ उनसे आदर्शों का मैल निकालते निकालते।

कल तक मेरा आलसी पड़ोसी जो कभी अपना पानी का गिलास इधर से उधर नहीं करता था, पानी तक अपने आप नहीं पीता था ,चाहे घंटों प्यासे ही क्यों न रहना पड़े , वह भी आज मानवता की रक्षा के लिए खाना पीना सब छोड़ कोरोना के भय की बहती गंगा में हाथ धोने के बदले नंगा नहाने की मुराद पाले मुहल्ले के सर्वनाश के लिए कोरोना की दवा बनाने में पसीना पसीना हुए जा रहा था। न भूख, न प्यास! बस, जैसे कैसे एकबार उसके मुख से जैसे तैसे कोरोना की दवाई घोषित हो जाए तो वारे न्यारे हो जाएं। जन्मों जन्मों के नोटों की तंगियों के पाप धुल जाएं। महामारी काल में दूसरे मानवता के रक्षकों की तरह मेरा ये पड़ोसी भी जान गया था कि आज कोरोना से बचने के लिए लोग हजारों देकर भी जहर तक खुशी से खाने पीने को तैयार हैं। बस, उस पर दवा का लेबल भर लगा होना चाहिए। 

और मजे की बात ! आज सुबह उसे पता नहीं क्या क्यों सूझी कि वह अचानक अपनी जन कल्याणार्थ सौ प्रतिशत आत्मनिर्भर देश में बनी सबसे पहली अपनी दवाई के पक्ष में अपने दावे को ठोस आधार देते इधर उधर देखने के बाद मेरे कान में पूरे आत्मविश्वास से फुफकयाया। झूठ की सबसे बड़ी खासियत यही होती है कि झूठ को जितने अधिक आत्मविश्वास से सच बना पेश किया जाए वह सच के आगे उतना ही तनकर खड़ा हो जाता है, बदतमीजों की तरह हंसते हुए,‘ मित्र! एक अति गोपनीय बात बताऊं? हफ्ता दस दिन पहले की वह काली रात मुझे अभी भी याद है। उस रोज अर्धसपने में मुझे धन्वंतरि मिलने आए। उन्होंने मुझ आधे जागे को तब पूरा जगाते पूछा,‘ और क्या कर रहे हो वत्स!’

 ‘सोया सोया भी बीवी से डर रहा हूं। पर आप कौन?’ और मैं चारपाई पर लेटा हड़बड़ाकर उठ बैठा।

’ मैं धन्वंतरि!’उन्होंने मुस्कुराकर कहा।

‘आप? आप मुझ बीमार के घर?’

‘ हां! मैं पहले बीमारों क घर ही आता था।  पर आजकल ठीकों के घर भी आने लगा हूं। मैं तुम्हें एक फार्मूला देकर तुम्हारे वारे न्यारे करने आया हूं।’

‘वारे न्यारे और मेरे? वारे न्यारे तो कुबेर करते हैं सर?’

‘ नहीं! ये समय मेरे द्वारा ही वारे न्यारे होने का समय है। कहो, केवल होने के पति से लखपति, करोड़पति होना चाहते हो?’

‘ ये भी कोई पूछने की बात है प्रभु? कलियुग में पैसे की भूख किसे नहीं?  देखो तो, संसार त्याग चुके तक इसी दौलत के चक्कर में आपस में मार काट मचाए हैं। माया से तो माया को भी परहेज नहीं फिर मैं तो?’

‘वत्स!  समाज में पेशेवरों के फिर भी कुछ दीन धर्म रहते हैं, पर पैसेवरों का कोई भी दीन ईमान नहीं होता । वह हर आपदा में जनता की जान गंवाकर भी अवसरों की मन से रक्षा करते हैं। तो लो, सबसे पहले मैं तुम्हें ही विश्व में सुरसा सा मुंह खोले कोरोना की दवा का फार्मूला देता हूं। इसे हर कोरोना से ग्रस्त ठीक हुए के खुले बंद मुह में डालो और मानवता की सेवा करते रातोंरात मालामाल हो जाओ।’

’  ‘पर प्रभु! मैं ऐलोपैथी का मारा आज लौंग, इलाइची के गुण तक नहीं जानता तो ऐसे में…’

‘अरे पगले, तुम्हें थोड़े खानी पीनी है वह मेडिसन! कोरोना से डरी, कोरोना से डरने वाली जनता को खिलानी पिलानी है बस! यह अच्छा नहीं करेगी तो बुरा भी नहीं करेगी।’

‘ मतलब??’

  ‘ उठो। आपदा को मौके में बदलो। मौके पर हाथ में बिन बैट के  छक्का लगाओ। मुसीबत में फंसे पीड़ितों की पीड़ाओं को कैश करना ही सच्ची मानवता होती है, राष्ट्र्धर्म होता है। ये लो कोरोना को मात देने का दसों लोकों का इकलौता फार्मूला और कुबेर हो जाओ! ’ और वे मुझको और केवल मुझको कोरोना से बचाने का इकलौता गुप्त फार्मूला दे अंतरध्यान हो गए।

मित्रो! मेरे जिस पड़ोसी के हाथों पूरी जिंदगी जिंदा तो छोड़िए, बीसियों जाल बिछाने के बावजूद मरा बटेर तक हाथ नहीं लगा, अब उसके हाथ भी महामारी से मुक्ति दिलवाने वाली दवा रूपी संजीवनी हाथ लग गई है। अब सोए सोए भी खुले मुंह इसके उसके सामने सीना चौड़ा कर, झोले में कोरोना के इलाज की शर्तिया इधर उधर से इकट्ठा की शीशियों में रस के बदले देशी सोमरस भर ताल ठोंकता दावा करता कहता फिर रहा है कि आज इस दुनिया में केवल और केवल उसके झोले में कोरोना की शर्तिया इलाज है। इस दवा की  बाकायदा उसने पड़ोसी की बीवी पर टेस्टिंग भी की है। उसका दावा है कि जो कोरोना के चलते कुछ कुछ पॉजिटिव हो गई थी वह अब फिर अपने पति की ओर को शत प्रतिशत निगेटिव हो गई है।

 अब औरों की तरह उसे भी कुछ औरों की तरह पता चल गया है कि आपदा में विपदा से बिदकती जनता को कैसे दुहा जा सकता है। आपदा में कमाई के अवसर कैसे तलाशे जाते हैं। खासकर ऐसे अवसर में जबकि आदमी और हर बीमारी से सहर्ष मरने को तैयार हो पर कोरोना से मरना तो वह तो वह बिल्कुल न चाहे। 

वैसे दवा का धंधा तो होता ही अवसर का धंधा है। अवसर नहीं तो दवा नहीं। इसलिए सफल अवसरवादी स्वस्थ जीवों को भी दवा बेचने के अवसर निर्मित कर सोच में रूकाव होने के चलते दिल में स्टंट डालते रहे हैं। इसलिए हर तारीख में आपदा में फंसे के नाम पर सबसे सरल काम कोई है तो बस, आपदा में फंसे के लिए आपदा से बचाने कम मरवाने की दवा बनाना सरेआम बेचना। मार्केटिंग अपनी अपनी भाई जी !

अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़

नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

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