काव्य ग़ज़ल

ख्वाहिश

भैया कैसे धरु में धीर ?

पल-पल अँखियों से बहे नीर l

अब के रक्षाबंधन न आ सकूँगी पीहर ,

कोरोना महामारी ने जकड़ लिया है शहर l

भैया आप भी तो न आ सकोगे ,

कलाई पर राखी न बँधवा सकोगे  l

मैं किसकी कलाई पर राखी सजाऊँगी ?

अपनी मनुहार किससे मनवाऊँगी ?

राखी तो आप तक पहुँच जाएगी ,

लेकिन भावनाएँ खाली रह जाएँगी l

वो जीवंतता कहाँ से आएगी ?

जो वक्त ने सिखाई है l

भैया ख्वाहिश यही है मेरी ,

जल्द ख़त्म हो यह बीमारी l

इष्ट-देव के चरणों में ,

अर्पित कर यह राखी

दुआ माँगती हूँ ,

तुम्हारी लम्बी उम्र की भाई l

भैया कैसे धरु में धीर ?

पल-पल अँखियों से बहे नीर l

अर्चना ‘आर्ची’    

जकार्ता , इंडोनेशिया

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