काव्य ग़ज़ल

एक नज़्म

काश

तुम समझ पाते

मेरे मोहब्बत की रिफ़अत को

खामोशी से जलते उस चिराग को

अधखुली आंखों से दिखे उस सपने को

तब शायद तुम महसूस कर पाते

मै कोई गुलफ़रोश नहीं

जो अपने कूचा-ए-दर्द मे

बेचने निकला हूँ,,,,, उलफत को

अपने ज़ख़्मों के शजर को

जिसे तलाश है एक अदद खरीददार की

जो बंद आँखों से अतराफ़ को महसूस कर सके

पर सच कुछ और है मेरे दोस्त

मै महज़ एक इश्क़ का तरफदार  हूँ

जिसकी रगों मे मोहब्बत की मय दौड़ती है

मेरे दिल की हर धड़कन

उससे हर रोज़ रूबरू होती है

उसकी आवाज़ को साफ साफ सुनती है

उसकी सरगोशीयों को भी महसूस करती है

कभी कभी तो ऐसा भी होता है

उसके गर्म सासों की ख़ुशबू

जाने कैसे मेरे वजूद मे उतरने लगती है

उसका नशा सर चढ़ कर बोलने लगता है

खुदा मेरा गुनाह माफ़ करे 

 तब मेरा दिल मेरे महबूब को आवाज़ देता है

मुसकुराता हुआ,,,एक बार गौर से देखो तो सही ,,,,,,,,,,,,

आवाज़ देर तक सुनाई देती रहती है ,,

कोई हलचल नहीं ,,,,कोई आहट भी नहीं ,,,,,

फिजा मे ,,,,,एक सन्नाटा सा बिखर जाता है

क्या इस आवाज का मक़सूम अब जबाब भी नहीं ??

खामोशी बेकरार दिल को तोड़ सी देती है

इंतज़ार अपनी फितरत मे नहीं

दिल ,,,,दिल से कहता है

हर एक मौज़ किसी दर्द का मुकद्दर है

तमन्नाओं के साये मे हमेशा सियह रात ही होती है

गुलों की आंच मे भी दिल सुलगता है

बीते लम्हे भी कई बार यूं ही रुला जाते हैं

बस,आरज़ू का दिया जलता रहता है

यही तक्मील है मोहब्बत की

यही सलीब है मोहब्बत की

यही दुआ है मोहब्बत की ,,,,,,,,,,,,

(रिफ़अत-ऊंचाई/अतराफ़-दिशा/गुलफ़रोश-फूल बेचने वाला/मक़सूम-भाग्य/तक्मील-पूर्णता)

राजेश कुमार सिन्हा

बांद्रा,(वेस्ट,),मुंबई -50

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *