काव्य ग़ज़ल

माँ

रात अंधेरी , चाँद अकेला तारे भी ना जाने कहाँ गए। काली – काली अँधियारी में, बेचारा चाँद अकेला क्या करे। मिल  जाये  आँचल  माँ  का, इसी उम्मीद में रात भर चले। सन – सन चल रही जो हवाएं, उनसे  शायद  फिर  चैन  मिले। कुछ काले , कुछ उजले बादल से चाँद आज बहुत घबराया […]

काव्य ग़ज़ल

तुम मिलना

तुम मुझे इरादों में मिलना कुछ देर तो ख़्वाबों में मिलना मैं भूल चुका हूँ इबादत का फ़लसफ़ा, हर्फों को नमाजों में मिलना.. कुछ लम्हे जमा किये हैं मैंने, उनसे तुम बरसातों में मिलना.. समझ जाओ जो इश्क़ का गणित, रूह के उधड़े धागों में मिलना.. दिन कट रहें हैं मुफ़लिसी में अभी, मेरे अच्छे […]

काव्य ग़ज़ल

“प्रकृति के अश्रु”

ना  अवरूद्ध  किये  होते मार्ग नदियों के, ना  किनारों  पर अतिक्रमण  किया होता, ना  बनते ना  टूटते बाँध,  यदि  मनुष्य ने अपनी स्वार्थसिद्धी का भ्रमण किया होता, भक्ति में बहकर ना बहाये होते पूजा अवशेष, ना बड़ी बड़ी मूर्तियों का विसर्जन किया होता, ना  तड़पता पानी की कमी से, यदि मनुष्य ने अंधाधुंध  ना इच्छाओं  […]

काव्य ग़ज़ल

विशुद्ध प्रेमार्थ ”

समर्पण को समर्पित होते अर्पण  को  अर्पित  होते कभी देखा है………. वृक्ष के अस्तित्व हेतु फल को गर्भ धरते हिमशिखरों को नदी हेतु स्वयं का तर्पण करते कभी देखा है………..।। १।। प्रत्युषा  को  निशीथ  से तुषार  अनुबंध  करते पतझड़ को मधुमास का स्वागत प्रबंध करते कभी देखा है………।। २।। तेल   को   कभी जल  के  तल  […]

काव्य ग़ज़ल

सजती कलियां

सजती हैं कलियां जहांवहां गीत गुनगुनाए जाते हैं हसरतों के फलक पर सपने बुने जाते हैं ऐ चांद, ज़रा ज़मीं पर उतरकर तो देखो तुम्हारी चांदनी पर मन्नतों के गीत लिखे जाते हैं खिलती है रातरानी जहां वहां अहसास महकाए जाते हैं नूर के धागों में गुंथकर प्यार के मोती पिरोए जाते हैं ऐ रात, […]

काव्य ग़ज़ल

ज़िद है

हाँ,अब अड़ जाने की ज़िद है रेगिस्तां मे भी गुलाब उगाने की ज़िद है मर जाये,मिट जाये अब परवाह नही बस दर-बदर हो जाने की जिद है। यूँ तो नदियाँ कै देखी है मैने भी लेकिन अब मुझे समंदर हो जाने की ज़िद है खाक होकर मिट भी जाऊ परवाह नही, “सूर्या” को लड़ जाने […]

काव्य ग़ज़ल

हमें न मालूम है

न मालूम करना चाहते हैं। हमें  इश्क था हमें  इश्क है, और इश्क ही बस करना चाहते हैं। न जीवन का ठिकाना पता है, न मृत्यु का अट्हास का सुना है। हर घड़ी,हर पल उल्हास में जीवन जिया है। जी रहे हैं और बस जीना चाहते हैं। न दुख की अनुभूतियों में ग़म किया। न […]

काव्य ग़ज़ल

तू नारी नहीं ललकार है….

क्यों कमजोर बनी फिरती है, अबला बनकर जुल्म सहती है,  डरती है,घबराती है,  ‎शहमी सी रहती है! काहे भूल जाती है….. तू नारी नहीं ललकार है, चलती शिवा की तलवार है, तू महाकाल की काली है!! तू लाचार नहीं,तू कमजोर नहीं  तू दुष्टों का करती नाश,काली अवतार है!! तू जगरानी तू ज्ञान की देवी तू […]

काव्य ग़ज़ल

नसीब

जिसे समझा  दूर वो  करीब मिल गया अंदर जो झांका मुझे नसीब मिल गया सुकूं की  तलाश में   भटका में दर दर वो मुझे मेरे ही इतना करीब मिल गया कब गुजरता है दिन कब शाम होती है इतना हसीन अब तो नसीब मिल गया सुनाके दर्द के किस्से  तड़पता था खुद ग़म में अब […]

काव्य ग़ज़ल

नदी को बहने दो

नदी को बहने दो विंध्य-सतपुड़ा के मध्य । नदी को दौड़ने दो चाँद-सूरज सितारों के संग । नदी को खेलने दो वन,वनवासी संग मस्त। नदी को श्रृंगार दो तट तरु लगा कर सब। नदी बहने से और बहने से नदी हैं ये तू जान। नदी को मत छेड़ो याद दिला देती वो केदारनाथ। चित्रपट मोहनजोदारो […]