काव्य ग़ज़ल

आओ दीप जलाएँ

जीवनकी उल्झनों  को भूल जाए। नन्हे दीपो से रोशनी फैलाए । मन का अंधियारा दूर भगाएँ आओ  दीप जलाएँ । पल भर न हो तिमिर का एहसास । दीप जले जब देहरी के पास। नन्हे दीप की यही है  आस । आओ दीप जलाएँ। दीपक बोला आज अंधेरे से लड़ जाऊगा। आज निशा को बतलाऊगा […]

काव्य ग़ज़ल

आओ दीप जलाएँ

जीवनकी उल्झनों  को भूल जाए। नन्हे दीपो से रोशनी फैलाए । मन का अंधियारा दूर भगाएँ आओ  दीप जलाएँ । पल भर न हो तिमिर का एहसास । दीप जले जब देहरी के पास। नन्हे दीप की यही है  आस । आओ दीप जलाएँ। दीपक बोला आज अंधेरे से लड़ जाऊगा। आज निशा को बतलाऊगा […]

काव्य ग़ज़ल

काल शोर जब करता है

काल शोर जब करता है ‘जीवन’ सहसा डरता है वर्षावन कहलाने वाला वही अमेज़न जलता है यह कवच हिमालय का जीवन कितना खोया है पूछो खारे सागर से तुम ये पर्वत कितना रोया है शहर नहीं, महामारी है मानव फिरभी सोया है इस माटी की छाती पर कितना पत्थर बोया है फसल भरी इमारत की […]

काव्य ग़ज़ल

अपने मुँह मियां मिट्ठू

कर  रहा  हर  वक्त  अपनी  वाहवाही, कभी  किसी  की  सुनता  नही  भाई। संपन्न  है  जो , खड़ा  है  उनके  पास, कभी जरूरतमंद के काम आया क्या?? अपने  ही  मुँह  बनता  मिया  मिट्ठू, करता हर वक्त मुर्गे की तरह कुकडु कु, कभी जरूरतमंद की जरूरत में किसी के  काम  आया  क्या?? सुबह से शाम तक यूँही […]

काव्य ग़ज़ल

हम नमन करें

कुर्बानियों का उनकी आज हम सतत मनन करें आजाद हिन्द फौज को दिल से हम नमन करें संघर्षरत हो हिन्द का सोचा किया सदा भला हर सिपाही देश की था राह पर सदा चला लड़के जो उचित था वो सम्मान दिया हिन्द को खून का कतरा एक एक बलिदान दिया हिन्द को पौरुष से सिंची […]

काव्य ग़ज़ल

अखबार

आज सुबह देखा एक अखबार उसमें थी ऐसी भरमार देख के आया गुस्से का गुबार खबरें देखी ऐसी पहले कभी न सुनी न देखी ऐसी दिल भी  हो गया तार तार कहीं खराबा खून का कही हत्या कहीं हो रहा बलात्कार  कहीं व्यभिचार और कहीं भ्रस्टाचार मन हो गया द्रवित सा रोष एवम दुख से […]

काव्य ग़ज़ल

ग़ज़ल

नज़र से नज़र को बचाकर तो देखो। नज़र से नज़र तुम चुराकर तो देखो। लड़ो  मत  सदा  निर्बलों  से  लड़ाई, बड़े  दुश्मनों  को  हराकर  तो देखो। इबादत समझकर  करो जग भलाई, कभी यार सबकाभलाकर तो देखो। सनम को सरे आम बाहों  में भरकर, रक़ीबों को अपने जलाकर तो देखो। अगर  आज़माना  है उनका  भरोसा, अकेले  […]

काव्य ग़ज़ल

अंधकार के बीज

ज्योतिपर्व पर जला  रहे हो पीड़ा के दीप लील चुका है तम परम्परा, संस्कृति और संस्कार ज्योति – पर्व के अस्तित्व बोध में अंधकार से लड़ना चाहते हो  तो आओ जलालो अपने भीतर की मशालें संजो लो अंतर्मन  में अस्तित्वबोध का दीप मन मे जब जलती है मशालें तब खुद ब खुद बदलने लगती हैं […]

काव्य ग़ज़ल

ये है जूठ

लोग धोखा देते हैं,  लोग झूठ बोलते हैं  आगे बढ़ने के लिए या  बस पाने के लिए।  वे इसे आवश्यक समझ से बाहर करते हैं  या  इसे एक सफल आदत बना लिया है।  कुछ बुरा लगेगा,  लेकिन  कुछ इस पर सो नहीं होगा।  कुछ को बचाने के लिए झूठ …  कुछ झूठ बोलना …  थोड़े […]

काव्य ग़ज़ल

इंसानियत का भाव

प्रेम करूणा दया और सद्भाव नहीं भूलूंगा कुछ भी हो इंसानियत का भाव नहीं भूलूंगा हमने बुजुर्गों को अपने पाया है वरदान में अपना मान भी बसा कनिष्ठों के सम्मान में भाषा जो प्रेम की है वो सबसे सरल जहान में ये साथ निभाता है व्यक्तित्व के उत्थान में प्रेम का सभी पर है प्रभाव […]