साहित्य

प्रकृति का स्वभाव सभी को सदा सुख देना है

बिलासपुर । प्रकृति का स्वभाव दया, क्षमा, शान्ति, दातापन, परोपकार व नि:स्वार्थ सेवा है। हम धरती में एक आम का बीज डालते है, तो बदले में प्रकृति हमें अनगिनत आम देती है। सिर्पâ फल नहीं साथ में ऑक्सीजन, लकड़ी, छाया, वर्षा और वातावरण में स्वच्छता भी प्रदान करती है। अचानक किसी कारण से हमें चोट लग जाती है तो प्रकृति अपने आप ठीक कर देती है। हमारा स्वस्थ शरीर प्रकृति का पहला उपहार है। प्रकृति हमें अनाज, फल, सब्जियां, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, पहाड़, सागर, नदी, झरना आदि देती है। सुख-सुविधाओं के लिए सोने-हीरे से भरपूर खानियां आदि अनेक साधन प्रदान करती है। प्रकृति हम पर अनेक उपकार करती है। उक्त बातें प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यलाय की स्थानीय शाखा टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन में आयोजित पांच दिवसीय राजयोग द्वारा व्यसन से मुक्ति शिविर के दूसरे दनि हमारे विचारों का पर्यावरण पर पड?े वाले प्रभाव के बारे में बताते हुए सेवाकेन्द्र संचालिका बी.के. स्वाति दीदी ने कही। दीदी ने आगे कहा कि यह सृष्टि नाटक प्रकृति अर्थात शरीर और पुरूष अर्थात आत्मा का खेल है। आत्मा को सृष्टि रंगमंच पर पार्ट बजाने के लिए शरीर का आधार लेना पड़ता है। शरीर प्रकृति के पांच तत्वों का बना हुआ है। प्रकृति का नियम है तंदरूस्ती न कि बीमारी। यदि शरीर बीमार भी होता है तो उस बीमारी को ठीक करने की सारी दवाइयॉं भी प्रकृति के पास है। आयरन, कैल्शियम, विटामिन्स, मिनरल्स आदि सब कुछ प्रकृति में मौजूद है। मनुष्य का मन जब प्रदूषित हो जाता है तब प्रकृति भी बिगड़ जाती है। फिर हमें शारीरिक बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। प्रकृति का स्वभाव सुख देना है फिर आज इतनी दुखदाई क्यों बन गई है यह समझना आवश्यक है। हमारे विचार और अनुभूतियां मिल कर वृत्ति बनती है और हमारी वृत्तियां ही वातावरण का निर्माण करती है। मनुष्य का आदि-अनादि स्वभाव है शान्ति, सुख, प्रेम, दया, क्षमा, परोपकार आदि। जब तक मनुष्य का स्वभाव प्रकृति के स्वभाव के साथ सामंजस्य में था तब तक प्रकृति सुखदाई थी। मनुष्य अपनी कर्मेन्द्रियों का मालिक बनकर श्रेष्ठ कर्म द्वारा सबको सुख देता था इसलिए प्रकृति भी सुखदाई और भरपूर थी। भारत सोने की चिडिय़ा कहलाता था। परंतु मनुष्य अपने दैवीय स्वभाव बदलकर धीरे-धीरे आसुरी स्वभाव जैसे काम, क्रोध, लोभ, घृणा, ईष्र्या, स्वार्थ हिंसा, भ्रष्टाचार आदि को अपना लिया इस कारण प्रकृति भी दुखदाई हो गई। प्रकृति के नियमों का उल्लघंन कर जंगल, पेड़-पौधो को नष्ट करना, कुड़े-कचरे के ढ़ेर, मूक जानवरों के प्रति अत्याचार और उनकी बद्दुआएं, चारो ओर हिंसक वृत्ति, अशुद्ध खनपान की आदत, कारखानों एवं गाडिय़ों से निकलने वाले जहरीले पदार्थ आदि मानव के कुकृत्यों ने परोपकारी प्रकृति को विकराल रूप दे दिया है।
संकल्प शुद्ध करते हैं वातावरण
वातावरण को शुद्ध करने का कार्य हमारे संकल्प करते है। मानव सोच के अंदर विषाक्तता आ गई है जो मनुष्य को अच्छाई दिखाई नहीं देती है। बुराई को अपने जीवन का मंत्र मानता है। मनुष्य के पास बहुत पैसे है, वैभव आदि सबकुछ है पर मनुष्य की उदारता चली गई है। अंदर का प्यार, सहजता और दिल का सम्मान, अपनापन खत्म हो गया है। मानव के विचार पहले शरीर को प्रभावित करते है फिर आस-पास के वातावरण और प्रकृति पर भी प्रभाव डालते है। प्रदूषित मन ही अनेक बीमारियों की जड़ है। मन में जब चिंता, अशान्ति, क्रोध, लोभ, भय आदि आते है तो शरीर के पांच तत्व असंतुलित होने के कारण दिल की धडक़न, व्लडप्रेशर, श्वास की गति अति तीव्र हो जाती है। यह आज प्रदूषित प्रकृति का ही प्रभाव है जो पानी की जमीन में कमी हो गई है और खाद्य पदार्थ स्वादहीन और जहरीले हो गये है। मनुष्य अपनी ही कर्मेन्दियों का गुलाम बनकर अपने ही विनाश का आह्वान कर रहा है। प्रकृति का अमूल्य उपहार शरीर को मानव व्यसन से ग्रसित होकर गलत कार्य में इस्तेमाल कर रहा है। सुख देने के बदले दुख दे रहा है। जो हम देते है वही हमें वापस मिलता है अच्छा या बुरा हम पर निर्भर करता है। इसलिए हमें सर्व प्राणी सहित प्रकृति को भी सदा सुख देना है। मानव के सोच के प्रदूषण को दूर करने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान जरूरी है।
पर्यावरण की रक्षा सबका कत्र्तव्य
दीदी ने प्रकृति को स्वच्छ बनाने के लिए कहा कि स्वच्छ मन और मधुर स्वभाव से हम सुखदाई प्रकृति और स्वस्थ शरीर का आनंद ले सकते है। धरती पर पेड़-पौधे और जंगल की सुरक्षा करना हम सबका कर्तव्य है। भारत में वृक्ष लगाना पुण्य का कार्य माना जाता है। हम पहले जिन वृक्षों की पूजा करते थे उनहीं को आज कांटने लग गये है। पिछले २५० वर्षाे में हमने दुनिया के आधे पेड़ो को कांट डाला है जिन्हे बनने में कई वर्ष लग जाते है। आज अधिकतर मनुष्यों को पेड़ो और पक्षीयों के नाम भी नहीं पता है। कईयों को तो कोयल, कौआ और गौरय्या क्या है वह भी नहीं पता है। हमने प्रकृति से अपने को विमुख कर लिया है। परमात्मा की सृष्टि में हर रचना स्नेह और सम्मान का पात्र है। हम जानवर, पशु-पक्षियों के प्रति दया प्रेम रखें और उनकी सुरक्षा करें। वे हमारा बहुत उपकार करते है उनके प्रति अत्याचार करना पाप है। जानवरों के प्रति हिंसा करना सीधा प्रकृति के साथ अन्याय करना है क्योंकि पशु-पक्षी प्रकृति के बहुत करीब है। हम अपना स्वभाव बदल दे, सबकी खुशी में अपनी खुशी महसूस करें, सभी को सम्मान दे तो प्रकृति को हमसे सकारात्मक प्रकंपन मिलेंगे। जाति, धर्म, देश, भाषा को भूलकर विश्व भ्रातृत्व की भावना रखें। मानव से प्रेम करना सीखें। सेवाकेन्द्र में विशेष राजयोग के अभ्यास द्वारा अपने सकारात्मक एवं शक्तिशाली प्रकम्पन्नो द्वारा प्रकृति को शांति और प्रेम का दान दिया गया तथा वृक्षारोपण किया गया।
मनोज
४.००
०६ जून २०१९

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *