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व्यंग्य

, पति, पत्नी और वो का चक्कर नवेन्दु उन्मेष पति, पत्नी और वो का चक्कर हमेशा बुरा होता है और अब उसमें सीसीटीवी कैमरा भी शामिल हो गया है। इसके बाद वीडियो वायरल होने से इज्जत पर पलीता लगता है सो अलग। यह बात मुझे कल पत्नी समझा रही थी। कह रही थी तुम जो […]

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(व्यंग्य)

झूठ और सच सत्य के उत्तर काल में जब झूठ, सच पर इस कदर हावी हो गया कि सच और झूठ का हर अन्तर समाप्त हो चुका है। और हर भक्त अपने ही बुने भँवर जाल में फ़ँस कर बिल्कुल कन्फ्यूज़्ड हो चुका है और उसे यह तक भी याद नहीं कि किस सच के […]

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व्यंग्य

सरकारी छुट्टियां प्रगतिकारक, पूजक,देवतुल्य..?      *दिनेश गंगराड़े , शासकीय कर्मी और असरकारी छुट्टियों का “दाल-बाफले” का सा साथ है।छुट्टियों से ही कर्मचारी ज़िंदा है।कर्मियों से ही छुट्टियों की जान व  शान तथा कैलेंडर की पूछ परख है।सही मायनों में कर्मी ही सरकारी, अंग्रेजी कैलेंडर का सर्वश्रेष्ठ पोषक है एवं ढेरों छुट्टियों से ही कर्मी का […]

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लाईन की महिमा

हमारे दैनिक जीवन में लाईन की  महिमा अपरम्पार है।वैज्ञानिकों ने तो एक बिंदु से दूसरे बिंदु को जो जोड़े उसे लाईन कह कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली लेकिन उन्हें क्या पता था कि आगे जाकर यह लाईन लोगों के लिए जी का जंजाल बन जाएगी। एक ईमानदार थानेदार ने अगर ईमानदारी से काम […]

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अब कुंआरों का ब्याह भी कराएंगे गुरुजन ! गांव में एक रांडे(कुंआरे)  का ब्याह नहीं हो पा रहा था। एक दिन सुबह-सुबह आत्महत्या की सोच रस्सी लेकर वह खेत की ओर निकल पड़ा। रास्ते में रिश्ते में भाभी लगने वाली महिला ने हंसी-ठिठोली के मूड में छेड़ दिया। बोलीं-देवर जी, रस्सी से फांसी खाने का […]

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व्यंग्य

  ‘‘इज्जत का आॅन लाईन पंचनामा’’ सरकारी बाबू रविवार को सण्डे कहता है। सण्डे से अंग्रेजी ज्ञान पर गर्व होता है। प्राइवेट में बाबू नहीं, असिसटेंट बन जाता है। सण्डे शब्द साहब के लिए है। बाबू- साहब की तरह सण्डे को सण्डे मनाना चाहता है। सुबह देर से उठे, अखबार और चाय टेबल पर हो। […]

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‘‘ बाढ़ में टीले पर बैठा आदमी’’ राष्ट्रीय आपदा है-बाढ़। पर्व के रूप में मनाते हैं लोग। हर साल जुलाई में आ जाती है। पहले तैयारी करते हैं, पर्व की तरह। राजस्थान में इस पर्व को कभी-कभार मनाया जाता है। बिहार और असम के साथ-साथ मुंबई में जोर-शोर से यह पर्व मनाया जाता है। बूढ़ी […]

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बाबाओं की बाबागिरी,हाय, हाय..?

            *दिनेश गंगराड़े, लोगो का तनाव दूर करते,करते बाबा खुद इतने तनाव में आ गए कि उन्होंने सूसाइड कर लिया,पढ़कर बेहद दुख व आश्चर्य हुआ।शोले फ़िल्म में एक देहाती दूसरे से पूछता है-भय्या ये सुसाइड क्या होता है?दूसरा कहता है-जब अंग्रेज मरते है तो उसे सोसाइड कहते है।ये अंग्रेज मरते क्यों है?इस बात का पता […]

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व्यंग्य

                ये आवाज उठाने वाले !                                     राजेंद्र बज             आवाज उठाना उनकी आदत है और इस आदत को वे कला समझते हैं। कलाकारी तो उनमें बचपन से ही विद्यमान थी लेकिन परिवार वालों की नजरों में वे महज निठल्ले ही थे। लिहाजा ज्यादा पढ़-लिख तो नहीं पाए किंतु राजनीति की गहरी समझ उनमें गजब […]

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व्यंग्य’

                 मुहूर्त का राजनीतिकरण हमारे देश में अब हर बात पर राजनीति होने लगी है,फिर उसका कुछ वजूद हो या ना हो।अब राम मंदिर का भूमिपूजन के  मुहूर्त को  भी राजनीति का रंग दिया जा रहा है। हद तो तब हो गई जब किसी ने कहा कि उस दिन  तो ’शुभ मुहूर्त’ है ही नहीें।जबकि […]