काव्य ग़ज़ल

गगन प्यार बरसाने लगा

                  • प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ओढ़ ली चूनर धानी वसुधा ने आज फिर धरती न धीर मन मौन इतराती है। अंबर नत होकर चूमता कपोल जब, श्यामल तन खिले सुमन हरसाती है। मोहित मदन मन पछुवा पवन बन, बिखेरता सुगंध मंद धरा मुस्काती है। पावस का वारि जल करता उर विकल, मिलन के स्वप्न नैन […]

काव्य ग़ज़ल

“बिखरता मजदूर”

देश पर जब भी विपदा आई,,  बस पड़ी मजदूर पर परछाई। कभी बाढ़ कभी सुनामी आई,, कभी सूखा ओलावृष्टि आई। कोरोना जैसी महामारी आई,, लाकडाउन की सख्ती बड़ाई। बंद हुई दो वक्त की कमाई,, चारो और दिखी बस रुसवाई। रेलगाड़ी बसो को बंद कराई,,  पैदल ही लेफ्टराइट कराई। भूख प्यास ने लाशे बिछाई,, पर सरकार […]

काव्य ग़ज़ल

जालिम व्यथा भुलावा देकर….

जालिम व्यथा भुलावा देकर, छुड़ा गई है गाँव महानगर से देखूँ  कैसे, वह  बरगद  की  छाँव? याद बहुत  आती है, मुझको  माटी  आँगन  की रोज  लोरियाँ  मुझे  रुलातीं, माँ  के  दामन  की खेतों की, खलिहानों की, उन वन की उपवन की बचपन  के  चौपालों की, हा! व्रज के कानन सी सदा बरसते नयन दुखारे, पाकर […]

काव्य ग़ज़ल

*मरती संवेदनाएं*

आज संवेदनाएं    मर चुकी हैं स्वार्थपरता की भट्ठी   में पूरी तरह जर चुकी हैं दैवीय आपदाओं से मरते हुए घुरहू,  काशी,पत्तू  के लिए भी          संवेदनाएं अपनी  भाषाई जुब़ान खो चुकी है   सड़क पर प्रजनन करती इक्कीसवीं सदी की स्त्रियां  स़िर्फ जादूगर का तमाशा है जहां तमाशबीन का मौन घुट रही संवेदनाओं […]

काव्य ग़ज़ल

उम्मीद_अभी_भी_बाकी_है

बेगानों की नगरी में अब, साथी बस इक साकी है। छला गया हूँ पल-पल फिर भी, उम्मीद अभी बाकी है।।              अरमानों का खून हो गया               जिंदा लाश बना हूँ मैं।               शाखाहीन बना डाला है               फिर भी ठूँठ खड़ा हूँ मैं। मेरे दिल के दरवाजों पर, यह दुनिया कब झाँकी है। छला […]

काव्य ग़ज़ल

प्यार किया हैं

—————- प्यार किया हैं जिसकी कोई परिभाषा नहीं, वो प्यार हैं जिसका कोई अर्थ नहीं, वो प्यार हैं जिसकी कोई सीमा नहीं, वो प्यार हैं जो हर सीमा को लांघ जाए वो प्यार हैं क्या इज़्हार करना ही प्यार हैं इंतज़ार करना प्यार नहीं हैं गलत कहते हैं वो लोग जो प्यार में इज़्हार करना […]

काव्य ग़ज़ल

मेरी उड़ान

 उड़ान बस इतनी ही है मेरी, जो तुम तक पहुंच जाऊं।  तुम्हारी छत की उस मुंडेर पर,  जहां तुम अक्सर बैठते हो।। पंख फैलाकर मधुर आवाज से, तुम्हें रिजाऊं कभी तुम्हारा मन बहलाऊ। आसमान को छूने की मंशा नहीं है मेरी,  ना ही किसी ऊंचे पेड़ पर बसेरा बनाऊं।। बस तुम्हारे आंगन में लगे, अमरूद […]

काव्य ग़ज़ल

बेटी

सौम्य, यथार्थवादी अहमियत रिश्तों की वंश , व्यवहारवादी फ़रिश्ता फरिश्तों की मर्यादित जग में संस्कार पुश्तों की लहराती बेटी हैं। मनचाहा छोड़ समाज से डरती हैं उम्मीदों को तोड़ रोज मरती हैं ताल्लुक़ घर से दूसरों के घर रहती हैं संस्कृति  बेटी हैं। खुशनसीब हैं पहली जिनकी बेटी हैं नमन हैं संस्कृति का विकास, सोना […]

काव्य ग़ज़ल

ये समय

अभी कुछ दिनों से संजो रहे हैं हम कहीं छुटी हुई सी परंपरा…. कही कहानियाँ तो पुराने किस्से… कही पुरानी यादें तो बीते हुए सिलसिले… गरमा गरम चाय के साथ होते लज्जदार गप्पे…. फिर लौटे वो पुराने खेल निराले… रसोई में भी घूला स्वाद का जादू अब कोई नहीं बोलता बाहर से कुछ मंगवा लू… […]

काव्य ग़ज़ल

*बाल गीत*

नभ में घोर घटा घुमड़ी है, अन्तर में कविता उमड़ी है। दोनों करते हैं मनमानी, झम-झम,झम-झम बरसा पानी।। बहुत प्रचण्ड पड़ी थी गरमी, सूरज करता था बेशर्मी। खत्म हुई उसकी नादानी, झम-झम,झम-झम बरसा पानी।। रोहन!मोहन!तुम भी आओ, बरसा का आनन्द उठाओ। आओ!आओ! गुड़िया रानी, झम-झम,झम-झम बरसा पानी।। महका है गुलाब अलबेला, चम्पा और चमेली बेला। […]