साहित्य

लघुकथा

आत्महत्या

” रामू भाई! टमाटर क्या भाव दे रहे हो?”

” मास्टर जी ! 50 रुपये किलो…” रामू ने मोबाइल से  नजरें हटाये बिना ही कहा।

” ठीक है! दो किलो तौल दो? ….और यह लो पैसे “मैंने रामू को पैसे देते हुए कहा।

” अरे बाबा! मैंने सौ रुपये ही छुट्टें दिये हैं ….और तुम, मुझे चार सौ रुपये वापस कर रहे हो। जरा मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलो जनाब?”

” माफ कीजिएगा मास्टर जी! टिक टॉक ऐसी चीज ही है कि इसे देखने के बाद लोग दुनिया को भूल जाते हैं”

” फिर तो रामू ! ऐसी बला से फौरन तौबा कर लो, क्योंकि यह काफी नुकसानदेय है। अब, मेरा टमाटर थैले में डाल दो, मुझे घर के लिए देर हो रही है” मैं रामू को हिदायत देकर सब्जी मंडी से घर लौटने लगा। तभी सड़क के किनारे तीन- चार बच्चों का झुंड; रामू की तरह ही मोबाइल में कुछ देखते हुए मसख़रा कर रहे थे। जब मेरी नजर उनकी नजरों से मिली तो सभी बच्चों के चेहरे के रंग फक पड़ गए। उनमें से एक बच्चा मेरी कोचिंग सेंटर में पढ़ता था।आशंकावश  जब मैं नजदीक पहुंचा तो उनके मोबाइल स्क्रीन पर एक चलचित्र चल रहा था, जिसमें एक छात्रा आपत्तिजनक स्थिति में एक लड़के के साथ अधरपान में मग्न थी।  मैंने गौर किया कि यह लड़की तो मेरे पड़ोस के शर्मा अंकल की बेटी थी जो मेरी कोचिंग सेंटर की सबसे मेधावी छात्रा थी। मैं तुरंत तेज कदमों से घर की ओर भागा। जब, मैं घर पहुंचा तो शर्मा अंकल के घर के सामने काफी संख्या में भीड़ जुटी थी। मैंने भीड़ के लोगों से माजरा जानना चाहा तो, पता चला कि शर्मा जी की बेटी टिक टॉक पर अश्लील वीडियो का शिकार हो चुकी थी। जिसे आए दिन कई लोग ब्लैकमेल कर रहे थे, जिससे तंग आकर उसने जीवन का आख़िरी रास्ता तय किया। जिस रास्ते का नाम था ‘आत्महत्या’..!

 – नीरज कुमार द्विवेदी

   बस्ती, उत्तर प्रदेश

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