लाइफ़स्टाइल

गहरी सांस का अभ्यास कीजिए

 शास्त्रों में कहा जाता है, काम, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, असत्य बोलने, चोरी, दूसरे का अनिष्ट करने, परपीड़ा, उतावली आदि प्रवृतियों से बचना चाहिए क्योंकि इनमें सांस तीव्र चलती है और ये प्रवृत्तियाँ व्यक्ति की आयुष्य को कम करती हैं I घर के वृद्धजन इन दुष्प्रवृत्तियों से बचने का कहते रहते हैं I भारतीय शास्त्रों में साँसों की संख्या एक दिन में 21600 दर्शाई गई है और यह लिखा है कि मनुष्य शतायु होता है I पाश्चात्य देशों में श्वसन गति 18 प्रति मिनट मानी गई है और उसी गणना-सूत्र से औसत आयु 83 वर्ष बताई जाती है I

 वास्तव में मनुष्य उथली और त्रुटिपूर्ण सांस लेता है और इसीकारण उसकी साँसों की गिनती कम समय में ही पूरी हो जाती है I शरीर कार्यिकी के प्राध्यापक चिकित्सा विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं कि मनुष्य की सामान्य साँसें स्वत: आती-जाती हैं, यह क्रिया स्वसंचालित होती है I मस्तिष्क से अन्त:श्वसन का सन्देश आता है तो श्वसन से जुड़ी विभिन्न मांसपेशियों के संकुचन से छाती में तीन घटनाएं घटित होती हैं I पहली घटना, छाती का पार्श्व अर्थात् साइड टू साइड चौड़ीकरण होता है, अर्थात् ट्रांसवर्स डायमीटर बढ़ता है I दूसरी घटना, मानवीय छाती का आगे से पीछे (छाती-पीठ) का चौड़ीकरण होता है, यानी एंट्रो पोस्टीरियर डायमीटर बढ़ता है I तीसरी घटना, छाती ऊपर से नीचे की तरफ बड़ी हो जाती है, अर्थात् वर्टिकल डायमीटर बढ़ता है, इसमें मध्यपट (डायफ्राम) नामक मांसपेशी लगभग डेढ़ सेंटीमीटर नीचे जाती है और इसके कारण पेट में स्थित अंगों पर दबाव पड़ता है और उस दबाव के परिणामस्वरूप मनुष्य का पेट बाहर आता है I

 वैज्ञानिक हुए हैं, राबर्ट बॉयल, उन्होंने सन 1662 में यह प्रतिपादित किया था कि जब आयतन (वाल्यूम) बढ़ता है तो दबाव (प्रेशर) कम हो जाता है, और जब दबाव कम होता है तो वह उस स्थान में वायुशुन्यता (वेक्यूम) उत्पन्न करता है I इसी सिद्धान्त के तहत इस वायुशुन्यता के कारण लगभग 350-400 मिलीलीटर वायु वातावरण से फेफड़ों में प्रवेश करती है, जिसमें प्राणवायु भी होती है I और फिर तुरन्त पश्चात् तीनों कार्यों में संलग्न मांसपेशियों शिथिल हो जाती हैं और इस कारण से तीनों आयतन पुन: सामान्य अवस्था में आ जाते हैं, अर्थात् फिर से जैसे थे, वैसी स्थिति में आ जाते है और उतनी ही वायु बाहर निकल जाती है I सामान्यतया अक्रियता की स्थिति में इस वायु प्रवाह अर्थात् टाइडल अथवा रेस्टिंग वेंटिलेशन कहा जाता है I हाँ, व्यायाम के समय वायु का प्रवाह कई गुना बढ़ जाता है I

इसका अर्थ यह हुआ कि जब मनुष्य का श्वसन प्राकृतिक होगा तो छाती चौड़ी होने के साथ-साथ पेट बाहर आना चाहिए, यदि पेट बाहर नहीं आता है, तो इसका अर्थ यह है कि वह त्रुटिपूर्ण सांस ले रहा है और निश्चित रूप से वह सांस उथली ही होगी I जब भी सांस उथली होती है तो शरीर की गतिविधियों हेतु अनिवार्य प्राणवायु की मात्रा की पूर्ति के लिए श्वसन गति अधिक होगी, तथा अधिक गति का अर्थ है, तुलनात्मक रूप से कम आयु I

सांस लेते समय वायु के फेफड़ों में प्रवेश के लिए सबसे अधिक उत्तरदायित्व डायफ्राम नामक मांसपेशी का होता है, यह समझ लो कि 75 प्रतिशत वायु इस मांसपेशी की गति के कारण होती है I यदि पेट बाहर नहीं आ रहा है, इसका अर्थ यह हुआ कि डायफ्राम नीचे नहीं आ रहा है, अर्थात् आवश्यक मात्रा में वायु फेफड़ों को प्राप्त नहीं हो रही है I

जागते समय गहरी सांस लें, जितनी गहरी सांस होगी, उतनी ही श्वसन की प्रति मिनट गति भी कम होगी, अधिक वायु का संचरण होगा और उम्र अधिक होगी, शरीर भी स्वस्थ और ऊर्जावान रहेगा I

सांस लेते समय ध्यान रखें की डायफ्राम का संकुचन अवश्य हो ताकि पेट बाहर आए और उचित मात्रा में वायु भीतर गमन करें I यही उचित और विज्ञानसम्मत श्वसन है I  

डॉ. मनोहर भण्डारी,

एमबीबीएस, एमडी

सेवानिवृत्त सह प्राध्यापक, फिजियोलॉजी

एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इन्दौर