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जैन ही नही जन-जन के संत थे जैनाचार्य ऋषभचंद्र सूरी जी

 

 *शिरीष सकलेचा* 

भारत भूमि में संत तो अनेकों हुए हैं लेकिन कुछ संत ऐसे भी है जो समाज विशेष के नहीं वरन संपूर्ण मानव जाति के लिए वंदनीय पूजनीय बनकर अपने नाम की अमिट छाप छोड़ देते हैं। ऐसे ही एक संत जैन समाज में भी हुए जिन्होंने अपने संतत्व  का दायरा सिर्फ जैन समाज तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि अपने ज्ञान, त्याग, तपस्या,आध्यात्म, सेवा भाव के बल पर वे जन जन के संत बन गए। जी हां हम बात कर रहे हैं जैन आचार्य, राष्ट्रसंत ,गच्छधिपति, ज्योतिष सम्राट , श्री *ऋषभ चंद्र सुरीशवरजी* म सा( ऋषभ बाबजी) की कर रहे हैं।

3 जून की उस मनहूस  रात  ने एक ऐसी शख्सियत को हम सभी से छीन लिया जो जीव दया, मानव सेवा का दूसरा नाम था। बाबजी का स्वास्थ्य कुछ दिनों से अस्वस्थ था। कोरोना संक्रमण के चलते आप जीवन और  मृत्यु से लड़ रहे थे।आपके उपचार के तमाम प्रयास भी हुए लेकिन परमात्मा भी असहाय हो गए और उन्हें अपने पास बुला लिया।

     ऋषभ बाबजी के देवलोकगमन की खबर हर किसी को गमगीन करने वाली है। उनकी गिनती हाई प्रोफाईल  संतों में आती है लेकिन उन्होंने हमेशा समाज के भले के लिए कुछ कर गुजरने की तम्मना रखी थी। ज्योतिषी में रुचि रखने वाले बाबजी आने वाले कल की बात बताते थे तो हजारों गायों का लालन,पालन करवाकर जीवदया के प्रति अपनी  भावना प्रकट करते थे।श्री मोहनखेड़ा तीर्थ में आपने विशाल गोशाला बनवाकर जीवदया के प्रति एक आदर्श समाज के समक्ष पेश किया है।जीवदया के साथ ही शिक्षा,स्वास्थ के प्रति आप हमेशा अपने आपको समर्पित करते आये है। मोहन खेड़ा में आपने ये सभी सुविधाएं  उपल्बध कराकर समाज के लिए परोपकार का काम किया।

    ज्योतिषाचार्य  जय प्रभ विजय जी के बाद आपने मोहनखेड़ा का जो विकास किया है वह पूरे देश मे एक मिसाल है। आपकी देख रेख में कम समय मे इस तीर्थ ने नई ऊंचाइयों को प्राप्त किया।

    बाबजी की एक खासियत थी कि आप जिस काम को  हाथ मे लेते थे उसे पूरा करवाकर ही छोड़ते। सरकार व प्रशासन भी आपकी बातों  को  या निर्देश को कभी टाल नही सकता। कोरोना महामारी की  दूसरी लहर जब तेजी से फैली तो आपके मन मे मोहनखेड़ा में कोविड सेंटर बनाने की कामना जाग उठी और देखते ही देखते आपने 300 बिस्तरों का सेंटर बनवाकर एक ओर मानव सेवा की मिसाल पेश की। आप प्रतिदिन सेंटर पर भी जाते थे। *सर्वजन हिताय* , *सर्वजन* *सुखाय* की  भावना को लेकर काम करने वाले बाबजी खुद अपने भक्तों को इस तरह अकेला छोड़ कर चले गए।

   बड़ावदा नगर से भी आपका लगाव रहा। दादावाड़ी पर आपके मार्गदर्शन में विशाल धर्मशाला का निर्माण कार्य तेज गति से चला। इसके लोकार्पण के लिए समाज आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था लेकिन यह प्रतीक्षा अब कभी पूरी नही होगी। यह इमारत आपकी याद जरूर दिलाएगी।

   बाबजी का मीडिया से विशेष लगाव रहा है। हमने श्री मोहन खेड़ा तीर्थ पर जैन पत्रकार सम्मेलन आयोजित किया था। जिसमे आपका मार्गदर्शन सभी को मिला था। इन्दोर  चातुर्मास के दौरान भी  जैन पत्रकार संघ के पदाधिकारियों को आपने अपना आशीष दिया था।व्यक्तिगत रूप से आपसे कई अवसरों पर चर्चा हुई। सरल स्वभाव के धनी बाबजी हर प्रश्न का सहजता से जवाब देते थे।  4  जून को आप अवतरित हुए  थे।एक दिन बाद ही आपका जनमोत्स्व मनाया जाता।3 जून को देवलोक की और गए। यह भी एक संजोग ही है। महापुरुषों में ही ऐसे संजोग देखने को मिलते है।खैर,होनी को कोई नही टाल सकता,लेकिन आपके चले जाने से जिन शासन ने  एक चमकता सितारा खो दिया है। जिसकी पूर्ति कीसी भी जन्म में नही हो सकती। गुरुवर आप तो अब वापस नही लोट सकते लेकिन अपना आशीष अपने भक्तों व समाज पर सदैव रखना।

शिरीष सकलेचा, सदर बाजार, बड़ावदा,जिला रतलाम मप्र

9907201314