काव्य ग़ज़ल

खिड़की और दरवाजे:पांच कविताएँ

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(1) 

अच्छे लगते हैं मुझको

अपने घर के

खिड़की और दरवाजे

नहीं भाते हैं

सड़क पर बजते हुए

बैंड और बाजे.

(2) 

घर में जब अकेला

बैठे रहता हूँ तो मुझे

अभिन्न मित्र की तरह

लगते हैं—

खिड़की और दरवाजे.

वे बजते हैं तो

दूर चला जाता है–

छाया हुआ सूनापन- सन्नाटा.

(3) 

दिन में धूप व हवा

तो रात में

रक्षक की तरह होते हैं–

खिड़की और दरवाजे.

वे न हो ं तो

कोई गारंटी नहीं है

जीवन में सुरक्षा की.

(4) 

जिंदगी में हर तरह की

अला- बला को

हर तरह की

बीमारी- लाचारी के

आक्रमणों को

आगे बढ़ कर रोक लेते हैं-

खिड़की और दरवाजे.

(5) 

यदि न हो ं

खिड़की और दरवाजे

तो मेरा ये समाज

दुनिया को बता दे

मेरे जीवन का

सारा राज.

और, दबा दे

मेरी अच्छाई की आवाज.

–जगदीश प्रसाद तिवारी–

2425, हाट मैदान, महू- 453441

जिला- इंदौर (म.प्र.)