लेख

दूर गगन की छांव में किशोर कुमार का सफर

हिन्दी सिनेमा जगत में अपनी दमदार आवाज और अभिनय का परचम लहराने वाले हरफनमौला किशोर कुमार को कौन भुल सकता है। जब भी चार अगस्त को खण्डवा वाले किशोर दा का जन्मदिन आता है तो उनके चाहने वाले सीधे मेमोरियल हॉल पहुंच जाते उनकी याद में और वही थोड़ी दूर गौरीकूंज मुक्तिधाम समाधी स्थल पहूंचकर दूध, जलेबी का भोग लगाकर हार्दिक श्रद्धांजलि देते हैं। किशोर कुमार अपने आपमें में एक मदमस्त पंछी की तरह थे जिनकी उड़ान देखकर अच्छे – अच्छे दांतों तले उंगली दबा लेते थे। आभास गांगुली से किशोर कुमार तक का सफर हैरतअंगेज और दिलचस्प रहा। किशोर कुमार की गायिकी और उनकी अदाएं दोनों ने उस दौर को एक ऐतिहासिक मोड़ दिया था हिंदी सिनेमा को। आला दर्जे के महान पाशर्व गायक मोहम्मद रफी साहब को भी सलाम करना पड़ा था, जबकि किशोर कुमार मोहम्मद रफी साहब को अपना गुरु मानते थे और रफी साहब को बहुत सम्मान देते थे। जब किशोर कुमार फिल्म इंडस्ट्री में नये नये थे तब मोहम्मद रफी साहब ने उनकी फिल्मों में गीत गाये थे।

किशोर कुमार हुड़दंग और शरारती रहे, बड़े भाई मुनि दा अशोक कुमार हिंदी सिनेमा जगत में अपना मुकाम हासिल कर चुके थे और उन्होंने इच्छा जाहिर की किशोर भी फिल्मी दुनिया में कदम रखे। किशोर कुमार जब छोटे थे तब खूब गीत गाकर कूदाफांदी करते थे। मुनि दा अशोक कुमार उन्हें बम्बई अपने साथ ले आये मगर किशोर कुमार बम्बई छोड़ खण्डवा चले जाते थे। उन्हें खंडवा से बहुत लगाव था और वह नहीं चाहते थे कि वह एक कलाकार बने। मगर मुनि दा अशोक कुमार की जिद के आगे उन्हें नतमस्तक होना पड़ा और उस समय के प्रख्यात गायक ए. के. सहगल साहब की शरण में जाकर गायिकी के गुर सीखकर साबित करना पड़ा। किशोर कुमार की बेचलर पढ़ाई इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में हुई और काॅलेज के दिनों में टेबल बजा बजाकर गीत गाकर दोस्तों को सुनाते थे और कैंटीन में जब तक टेबल पर चाय और नाश्ता नहीं आ जाता तब तक टेबल बजा बजा के शोर शराबे से परेशान करके रख देते थे।

किसने सोचा था कि एक फक्कड़ और शरारती हिन्दी सिनेमा जगत में एक नया इतिहास रचेगा। अपनी दमदार आवाज और एक्टिंग के दम पर किशोर कुमार ने संघर्षों के साये में पलकर जो मुकाम हासिल किया उसे शायद ही कोई भुल सकता है। एक बेहतर गायक और अभिनेता के साथ साथ किशोर कुमार फिल्म निर्देशक, गीतकार, संगीतकार भी रह चुके हैं। चलती का नाम गाड़ी, पड़ोसन, दूर गगन की छांव में, बढ़ती का नाम दाढ़ी, दूर का राही जैसी सुपरहिट फिल्में निर्देशित की। दूर गगन की छांव में फिल्म में उन्होंने कुछ नया किया था उस दौर में। इस फिल्म को निर्देशित करने, संगीत देने, पटकथा व कहानी लिखने के साथ साथ संगीत देकर किशोर दा ने साबित कर दिया था कि मेहनत और जुनून के आगे असंभव को संभव में बदला जा सकता है‌। अपनी कामेडी फिल्मों से और कॉमेडी एक्टर की छवि से वह थोड़े निराश हो गये थे और इस निराशा को आशा में बदलकर दूर गगन की छांव में फिल्म लेकर आए जिसमें बाप बेटे के अटूट प्रेम को दर्शाया गया। इस फिल्म में किशोर कुमार ने शंकर नाम के फौजी का किरदार निभाया था और बाल कलाकार के रूप में रामू का किरदार अमित कुमार ने निभाया था। यही अमित कुमार आगे जाकर अपने पिताजी के पदचिन्हों पर चलते सफल गायक बने।

इंसान अपनी तकदीर खुद लिखता है और हरफनमौला किशोर कुमार ने अपनी तकदीर लिखकर साबित कर दिया था कि –

 राही तू मत रुक जाना,  तूफ़ां से मत घबराना

कभी तो मिलेगी तेरी मंज़िल कहीं दूर गगन की छांव में

समीक्षा :- मनीष कुमार पाटीदार, इटावदी महेश्वर

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