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चार साल पहले गिरे पुल दोबारा नहीं बने तो ग्रामीणों ने अंदोलन की ठानी

ज्वालामुखी प्रदेश सरकार के विकास के दावों के विपरीत ज्वालामुखी विधानसभा क्षेत्र के चंगर इलाके के लोग राजनैतिक उपेक्षा एवं सरकारी उदासीनता के चलते मूलभूत सुविधाओं के लिये तरस रहे हैं। हालात इस कदर पेचीदा हो गये हैं कि कई इलाके बरसात में पूरी तरह कट गये हैं। चार साल पहले गिरे पुल अभी दोबारा नहीं बनाये जा सके हैं।
चंगर इलाके के खुंडिया से सटे थड़ा गांव के लोग इन दिनों अपने घरों में कैद होकर गये हैं। इसी तरह आघार से अमकंन डढुरू का भी यही हाल है। इन गांवों को जाने वाले पुल बरसात में बह गये हैं। लेकिन विभाग इन्हें दोबारा बनवाने में पूरी तरह नाकाम रहा है। जिससे स्थानीय लोगों में गुस्सा है। वीरवार को इन समस्याओं को लेकर एक बैठक के दौरान ग्रामीणों से भाजपा नेता आरती दत्त शर्मा मिले,तो गा्रमीणों ने उनके सामने अपनी बात रखी। आरती दत्त शर्मा ने बताया कि दोनों गांवों के पुल नहीं बन पा रहे हैं। एक पुल तीन साल पहले गिरा था,जबकि दूसरा पुल बीते साल गिरा। सरकार बदलने के बावजूद भी पुल नहीं बन पाये। ग्रामीणों ने बताया कि बरसात के दिनों वह कैद होकर रह जाते हैं। पहाड़ी और दूसरी तरफ नदी होने की वजह से वह कहीं नहीं जा पाते। लिहाजा प्रदेश सरकार जल्द ही इन पुलों का निर्माण करवाये। एक अन्य ग्रामीण ने बताया कि उन्होंने गांव की समस्या के बारे में स्थानीय विधायक एवं प्रदेश योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष रमेश धवाला को खत लिखा तो उन्होंने पुल के निर्माण के लिये साढ़े चार लाख रूपये स्वीकृत होने की बात कही।लेकिन विभाग के अधिकारी कहते हैं कि उनके पास कोई पैसा नहीं आया है। एक ग्रामीण ने बताया कि गांव को जोडऩे वाला आधार से ढढुरु पुल लगभग चार साल पहले ही पानी में बह गया था, जिसे आज तक दोबारा नहीं बनाया जा सका है। इस समय लोगों को या तो नदी पार करके जाना पड़ता है या फिर उन्हें दो किलोमीटर पहाड़ चढक़र दूसरी तरफ जाना पड़ रहा है।
ग्रामीण हैरान हैं कि उनके साथ यह भेदभावपूर्ण रवैया क्यों अपनाया जा रहा है। हालत इस कदर बिगड़ रहे हैं कि बीमारी की सूरत में मरीज को पालकी में बिठाकर खड्ड को पार करना पड़ता है। बरसात में स्कूली बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। ग्रामीणों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर से पुलों के निर्माण के लिये धन मुहैया कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि उनकी मांगे जल्द नहीं मानी गईं तो वह सडक़ों पर उतरेंगे।
, 22 अगस्त (विजयेन्दर शर्मा)

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