काव्य ग़ज़ल

दीवाली

सोच  रहा हूँ  क्या कभी  गरीब के   घर  दीवाली होगी

उसकी रात हर रात की तरह इसबार भी   काली होगी

कई  योजनाएं  मेरे देश में  गरीबों   के   लिए बनती हैं  

कोई  योजना  गरीबों   के लिए भी क्या  दीवाली होगी

पैबन्द  में    जीने   वाला  पैबन्द   में  ही क्यूँ  जीता  हैं

क्या  कभी उसकी भी अपने पैबन्द से   निकाली होगी

बड़े बड़े  घरों में रहने वालों  के घर रोज़ दीवाली होती

क्या  किसी  रोज़   गरीब की  झोंपड़ी में दीवाली होगी

दिये  जलाये  बहुतेरे घर में  क्यूँ  हो  ना सका  उजाला

दिया जलवा गरीब के घर उसके के घर  दीवाली  होगी

खर्च कर  जितना जी  चाहे या  उससे भी    दूगना कर

सामान खरीद गरीब से  उसकी रात भी  उजाली  होगी

इस बार मजा आ जायेगा तेरे साथ इक गरीब के घर में

रोशनी होगी जब उसके घर इसबार वहाँ दीवाली  होगी

पूरनभंडारी सहारनपुरी

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