काव्य ग़ज़ल

उजियार के दोहे

दीप दीप की ज्योत से,हो जग में उजियार।

भला भला हो सब तरफ,बढ़े जगत में प्यार।।

2.

मन में उजियारा भरें, छोटे छोटे दीप।

दमके जीवन ये सदा,हो जस मोती सीप।।

3.

तिमिर क्षेत्र में जब कभी,आ जाता उजियार।

सभी चहकते मचलते,बड़े छोट मुटियार।।

4.

घर आँगन रोशन रहे,रोशन मन के द्वार।

रोशन दिल की बस्तियाँ,करें प्यार विस्तार।।

5.

धनतेरस धड़कन बने, दिल दीवाली प्यार।

धवल द्रव्य संग्रह करें, हो लक्ष्मी सत्कार।।

6.

जीवन कोरी कल्पना,बिन प्रकाश के मीत।

पूज्य सदा से रोशनी, दीप संग हो प्रीत।।

7.

उजियारा हो दीप का,तम मन का हर जाय।

राग द्वेष के तिमिर का,अंश न जग रह पाय।।

8.

दीपक अवली से सजी , गाँव शहर की गैल।

खरा उजियार हो तभी, मिटे दिलों का मैल।।

9.

स्वयं जले दे रोशनी, लघु काया का दीप।

वही ‘ हितैषी ‘पूज्य है, ज्यों मोती युत सीप।।

     प्रबोध मिश्र ‘ हितैषी ‘

बड़वानी(म.प्र.)451-551

      मो.94259-81988

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