साहित्य

(कुुुछ याद कुुुछ हक़ीक़त)

बचपन

बचपन होता ही बड़ा खूबसूरत है वरना जिसको कल क्या हुआ याद नहीं रखता भला वो बचपन क्या याद रखेगा….!

बचपन…

कभी खेलने के लिए चुपके से भाग जाते थे तो कभी शक्तिमान देखने के लिए खेलने ही नहीं जाते थे।

है न खूबसूरत ये सुनना कि टीवी देखने के लिए आज जो बच्चे रिमोट लेकर दौड़ते हैं वही बीते कल में हम एंटीना बनाने में पसीने बहाते थे…

और आज तो बारिश से इंफेक्शन होने लगे!

वो दौर शायद ही आये जब बारिश शुरू होने पर दोस्तों के साथ सड़क पर जहाँ पानी भरा रहता वहीं पर कूदते थे…

जिस कागज़ को आज पेन की मार सहनी पड़ रही वही हम चॉक और स्लेट लेकर अपना भविष्य उसमें लिखते थे….

अगर बचपन को लिखना चाहूं तो शायद…..मैं नहीं लिख सकता किसी पल को छोड़ना नहीं चाहता।

और उसको शब्दों से बांध दूँ ?ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ये जवानी और जिम्मेदारी ने बचपन को बांध दिया ?ये मैं कतई नहीं कर सकता ।

उसे आज़ाद रहने दो।

सांस लेने दो उसको गांव में,

शहर में मत घसीटो….

कागजों में मत उकेरो,

पन्नों में सिमटना नहीं आता उसे…

उसे तो आज़ाद खेलना,घूमना और सपने देखना यही तो आता है।

एक बचपन ही तो होता है जिसको संसार में क्या हो रहा है इससे  कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

————–गौरव शुक्ला ‘अतुल’

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