लेख

*डिजीटल सिस्टम और अफसरी फेर में फंसा कोरोना पैकेज..*

(डॉ अजय खेमरिया)

कोरोना संकट से निबटने के लिए देशवासी मुक्त हस्त से दान कर रहे है।यह दान पीएम केयर फंड और राज्य के मुख्यमंत्री सहायता कोष में दिया जा रहा है।ह्रदय को प्रफुल्लित करने वाले दृश्य भी इस दौरान देखने को मिल रहे है।बच्चे अपनी गुल्लक तोड़कर इस फंड के लिए धन दे रहे है।कोई अपने प्रिय परिजनों की तेरहवीं के धन को दान कर रहा है। वर पक्ष के लोग विवाह में दिए जाने वाले दहेज़ को पीएम केयर में देने की सलाह वधु पक्ष को दे रहे है।कश्मीर में हज जाने के लिए रखी 5 लाख की राशि एक महिला ने संघ के सेवाभावी स्वयंसेवको को दान कर दी।इन  सरकारी दान ग्रहीता के अलावा लाखों लोग भोजन,राशन,दवा,परिवहन के सेवा प्रकल्प में  स्वप्रेरित भाव से सलंग्न है।

इस सुकूनभरी तस्वीर का एक दूसरा पक्ष सरकारी सिस्टम की जड़ता और दुरूह कार्यप्रणाली का भी खड़ा हो रहा है।केंद्र सरकार ने 1.70लाख करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की है।किसान,मजदूर,महिला,दिव्यांग,वर्ग के लिए जो प्रावधान किए है उन्हें अफसरशाही और बाबुशाही की अजगरफ़ान्स से इस समय बचाना आजाद भारत के प्रशासन तन्त्र का सबसे चमत्कारिक घटनाक्रम होगा।मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने घोषणा की है कि राज्य में बगैर राशन कार्ड वाले जरूरतमंदो को भी सरकारी दुकानों से मुफ्त राशन दिया जाएगा।इस बीच प्रदेश में करीब दो लाख परिवार ऐसे है जो खाद्य सुरक्षा गारन्टी के दायरे से बाहर है।इन परिवारों के पास राशन कार्ड तो है लेकिन इनके नाम नई बायोमेट्रिक मशीनों में दर्ज नही है।इसलिए इन्हें राशन नही मिल पा रहा है।लॉक डाउन के बीच हर कलेक्टर दफ्तर मे ऐसे लोग फरियाद लेकर खड़े है।सरकारी मुलाजिम नियमों का हवाला देकर चुप है।किसान कल्याण निधि के सरकारी पोर्टल पर 96073451 किसान पंजीकृत है लेकिन 11 फरवरी को केंद्र सरकार ने लोकसभा में दिए जबाब में बताया कि इनमें से 84472629 किसान इस योजना में लाभान्वित हो रहे है।शेष 1करोड़ 16 लाख से अधिक किसान तकनीकी कारणों से इस योजना का लाभ नही ले पा रहे है।ऐसा बैंक खाते ,आधार नम्बर दुरस्त न होने के कारण है।इस बीच केंद्र सरकार ने कोरोना पैकेज में भी 8.6करोड़ किसानों को ही इस दायरे में लिया है जाहिर है ये 1 करोड़ 16 लाख किसान परिवार  2 हजार की मदद से भी वंचित रहेंगे।

सरकार ने श्रमिकों के खातों में एक हजार रुपए डालने की निर्णय लिया है। लेकिन मप्र में ही केवल 8.6लाख मजदूर इसके दायरे में है शेष इसलिए वंचित हो गए क्योंकि सरकार ने जिस श्रम शक्ति एप के जरिये इनका पंजीयन किया था उसमें तकनीकी कारणों से करीब एक करोड़ वास्तविक मजदूर रजिस्ट्रेशन नही करा पाए।केंद्र सरकार के सुगम्य भारत योजना में दिव्यांगजनों के लिए यूनिक आइडेंटिटी कार्ड बनाने का काम  पिछले दो बर्षो से चल रहा है इस एप्प बेस्ड डेटा में अभी आधे ही दिव्यांग रजिस्टर हो सके है ऐसे में सभी लोगों तक केंद्रीय मदद कैसे सुनिश्चित होगी?

असल में भारत की प्रशासनिक मशीनरी यथास्थितिवाद और जड़ता पर अकाट्य रूप से अबलंबित है।मानवीय संवेदना अफसरशाही के दिल और दिमाग में कभी सरकारी जड़ता से ऊपर स्थान नही ले पाती है।यही कारण है कि लोककल्याण से जुड़ी अधिकतर योजनाएं परिणामोन्मुखी नही हो पाती है।

कोरोना जैसी आपदा अभूतपूर्व है लेकिन सरकारी तंत्र इस संकट को भी परम्परागत तौर तरीकों से निबटने में लगा है।बेहतर होता मुख्यमंत्री राहत कोष को जिला स्तर पर संचालित किया जाता क्योंकि इस कोष में लोग इस भावना से दान देते है कि त्वरित जरूरतमंद पर सहायता पहुंचे लेकिन जिस खाते में यह धनराशि जाती है उसकी व्यय प्रक्रिया इतनी दुरूह और जटिल है कि आपदा के बाद उसका कोई वास्तविक महत्व ही नही रह जाता है।मसलन चादर या पलँग खरीदे जाने है तो पहले कलेक्टर अस्पताल से मांग पत्र लेंगे फिर कलेक्टर इस आशय के पत्र शासन को भेजेंगे शासन धनखर्ची के लिए मार्गदर्शी नियम बनाएगा।वित्त विभाग स्वीकृति देगा।जिलों को धन जारी होगा फिर भंडार क्रय नियमों के अनुरूप टेंडर/जेम पोर्टल प्रक्रिया होगी।वेंडर सप्लाई करेगा।कलेक्टर सबन्धित विभाग को मदद के लिए नोडल निर्धारित करेगा।इस पूरी प्रक्रिया को कागज,नोट शीट,आर्डर, पर ही दौड़ना पड़ता है।बाढ़, भूकम्प,या अन्य आपदा पर सहायता का यही मेकेनिज्म है।हॉ इससे पहले सर्वे भी होता है कि कौन पात्र है अपात्र है।

बेहतर होगा मुख्यमंत्री सहायता कोष जिला बार निर्धारित कर इस जटिल प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए।जिस जिले में इस मद के लिये राशि न मिले उसमें सरकार राशि डाले।इसी तरह पीएम फंड भी राज्यवार दानियों के हिसाब से निर्धारित किया जा सकता है उसके व्यय की अधिकारिता को मुख्यसचिव और केंद्रीय गृह सचिव के साथ सयुंक्त किया जा सकता है।ऐसा करने से आपदा के समय सरकारी मदद को समयानुकूल और त्वरित बनाया जा सकता है।अन्यथा यह सरकारी सिस्टम के मकडजाल में फंसी ही रहेगी।जो स्थानीय दानी है उन्हें भी यह सन्तोष होगा कि उनकी राशि का उनकी नजरों के सामने ही उपयोग किया जा रहा है।सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली में किस हद तक यथास्थितिवाद है इसकी नजीर एमपी एमएलए फंड के साथ समझी जा सकती है।लगभग सभी सांसद विधायक कोरोना मदद के नाम पर लाखों करोड़ों की राशि स्थानीय अस्पतालों को मास्क,सेनिटाइजर, वेंटिलेटर और दूसरी एसेसरीज के लिए जारी कर चुके है लेकिन आज तक किसी कलेक्टर ने इस राशि के कार्यादेश जारी नही किये है जबकि आबंटन पत्रों में साफ लिखा है कि राशि किस मद में व्यय की जानी है।जाहिर है सरकारी सिस्टम की दुरूह कार्य संचालन प्रक्रिया में यह त्वरित गति से संभव ही नही है।जब इस राशि का उपयोग होगा तब शायद इन वस्तुओं की सामयिक उपयोगिता एक चौथाई भी न रहे।वस्तुतः हमारे प्रशासन तन्त्र की कार्यविधि में जनोन्मुखी तत्व 70 साल बाद भी सुनिश्चित नही हो पाया है।ऐसा इसलिए कि चुनी हुई सरकारें सिर्फ अफसरशाही के दिमाग से चलती है औऱ अफसरशाही का मूल चरित्र ही जड़ता,बिलंब,और  बेफिजूल कागजी पत्राचार रहता है।भले ही कानून बनाने का जिम्मा चुनी हुई विधायिका के पास है लेकिन यह केवल एक अवधारणा है जो सदैव ब्यूरोक्रेसी के यहां बंधक बनी रहती है।

डिजिटल इंडिया के लक्ष्य पर जिस अंधाधुंध तरीके से काम हो रहा है उसने कुछ व्यावहारिक दिक्कते भी निर्मित की है इनके परिक्षालन का यह सबसे अच्छा अनुभव है।सरकार को चाहिए कि इस संकट की घड़ी में डिजिटल वेरिफिकेशन की पात्रता  मापदंड की परिपाटी को शिथिल कर दे क्योंकि आंकड़े गवाही दे रहे है कि करोड़ो  वास्तविक लोग इसके चलते लाभ से वंचित हो रहे है।

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