काव्य ग़ज़ल

हाँ है मर्ज मुझे….

हाँ मर्ज है मुझे,

फकत दूनिया उसे बेसबब कहे|

मुझे मर्ज है खिदमतगार बनने का

उन लोगो का जो बैठे है सड़क किनारे,

मजबूर, बेबस निगाहो से तकते|

हाँ मर्ज है मुझे,

उन सबका लाड़ला बनने की,

जो लाचार पड़े है वृद्ध आश्रमो में ,

राह तकते किसी ‘अपने’ की|

हाँ है मर्ज मुझे,

उन तकती आँखो में आशा देने की,

जिनके सपूत खड़े है सीमा पर,

देश पर कुर्बान जाने के लिए|

हाँ है मर्ज मुझे,

एक अच्छा,सच्चा नागरिक बनने का,

जो उखाड़ फेंके सड़ी-गली,लाचार,

चरमराती  समाज व्यवस्था को,

ताकि साँस ले सके हम खुली हवा में,

नवनिर्मित भारत की|

हाँ मर्ज है मुझे|

अंजू निगम

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