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फ़िल्मों मे छुपा कोरोना से लड़ने का उत्साह

किसी ने सच ही कहा है ” सिनेमा समाज का आईना होती है।” राम तेरी गंगा मैली फ़िल्म का एक दृश्य आज के हालातों में एकदम सटीक नज़र आता है। फ़िल्म के एक दृश्य में नायिका खलनायक से बचने के लिए श्मशान की शरण लेती है तभी श्मशान का पहरेदार नायिका से पूछता है कि क्या उसे यहा डर नही लगता ? तब नायिका कहती है डर तो जिंदा लोगों से लगता हैं। इस फ़िल्म को देखकर ऐसा लगता है जैसे पटकथा और संवाद लिखने वाले ने यह दृश्य संवाद आज के  हालातों की ध्यान मे रखकर लिखे हैं। आज इंसान को डर किसी अज्ञात या मृत्य व्यक्ति से नहीं बल्कि अपने आसपास के ही चिरपरिचित व्यक्ति से ही है।

       ये फिल्में ही हैं जो समाज में घट रही घटनाओं से परिचित कराती है तो कभी प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ना सिखाती है। अब अगर सिनेमा के दृश्यों से निकलकर इसके सुमधुर गीतों का रुख करे तो यही गीत हमारी खुशियों को दुगना और और दुखों को कम कर देते हैं । कोरोना के चलते सुनसान पड़ी सड़को को देखर होठो पर एक गीत आ जाता है “छुप गए सारे नज़ारे ओए क्या बात हो गई….” और सारी परेशानी भूलकर चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती हैं। दिन भर घर की दीवारों  और छतों को ताकने के बाद खिड़की से झांकती आँखे यही गाती नज़र आती है ” सुरमई अखियों में नन्हा मुन्ना एक सपना दे जा रे…”। लॉक डाउन का कम होता हर दिन और कोरोना से जीतकर अस्ताचल को जाते सूरज को देखकर राजकपूर की फ़िल्म का यह गीत गुनगुनाने को मन करता है शाम का सूरज बिंदिया बन कर सागर में खो जाए सुबह-सवेरे वो ही सूरज आशा लेकर आए नई उमंगें नई तरंगें आस की ज्योति जगाए रे आस की ज्योति जगाए

तुम आज मेरे संग हँस लो तुम आज मेरे संग गा लो

और हँसते-गाते इस जीवन की उलझी राह सँवारो…।  वैसे तो जिंदगी की जंग को दुनिया के रण में जीतते सबने देखा है पर कोरोना से ये हमारी पहली ऐसी जंग है जो घरों में बैठकर ही जीती जा सकती है। कोरोना से हारते हुए जब मौत के आंकड़े टीवी या सोशल मीडिया पर आते हैं तो फिर एक गीत होठो पर आ जाता है “अभी मुझ में कहीं बाकी थोड़ी सी है जिन्दगी जागी धड़कन नई जाना ज़िन्दा हूं मैं तो अभी…।  भगवान करे हम इसी तरह अपनी  जीत की ओर बढ़ते रहे और फिर से बन्द पड़े सिनेमा उद्योग में हमारी जिंदगी को खूबसूरत बनाने वाली फिल्में बननी शुरू हो जाए। जाते -जाते एक गीत और याद आ गया यकीनन ये गीत कोरोना से लड़ने में हमारे अंदर एक उत्साह भर देगा । आप भी सुनिये -हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िंदगी

छाँव है कभी, कभी है धूप ज़िंदगी

हर पल यहाँ जी भर जियो

जो है समाँ कल हो न हो।

  प्रो.वन्दना जोशी

पत्रकारिता   विभाग

       {इंदौर}

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