साहित्य

लघुकथा

सोशल डिस्टेंसिंग

‘शांतिलाल, को बेटे के पास शहर गये, एक साल हो गया, जब से गाँव की तरफ मुह नहीं किया।’ ‘बड़े आराम से शहरी दुनिया में रम गया होगा।’ गाँव के चार छः बुजूर्ग चौपाल पर बैठे-बैठे देश दुनिया के लॉक डाउन के समाचार सुनकर शांतिलाल के बारे में सोच रहे थे। एक ने तंज कसते हुआ कहा-‘उसका बेटा गाँव का घर बेचकर माल भी तो साथ ले गया है।’ शान्तिलाल को क्या परेशानी होगी? रघु, जो शान्तिलाल का खास मित्र था। उससे रहा न गया। उसने बड़े शहर में कोरोना महामारी की विभीषिका के टीवी आदि समाचार में देखकर अपने मित्र को लॉक डाउन की हिदायत देने के लिए फोन किया। ‘अरे भाई शांतिया कैसे हो?’ ‘सुना है तुम्हारे शहर में महामारी से बहुत से लोग संक्रमित हो रहे है।’ ‘मेरे यार साठ की उम्र पार के लोगों को लॉक डाउन का विशेष ध्यान रखना है।’ ‘घर से बाहर नहीं निकलना है। किसी से हाथ नहीं मिलना है। सामाजिक दूरियां बनाये रखना है। तभी तुम सुरक्षित रहोंगे।’ चंद सेकेंड मौन रह कर डबडबाई आँखें व भर्भराये गले से बोला-‘रघु मेरे यार मुझे कुछ नहीं होगा, क्योंकि मैं जिस दिन से आया हूँ। बेटे के गेस्ट हाऊस में लॉक डाउन में ही जी रहा हूँ।’ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन तो इतना किया है कि सालभर से अभी तक, पोते को भी गले नहीं लगाया है।

लेखक

‘ विजय जोशी ‘शीतांशु’

संयोजक/संस्थापक

लघुकथा शोधकेंद्र महेश्वर

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