काव्य ग़ज़ल

“मोती बन कर बिखरना पड़ता है”

यूं ही नहीं उतर पाते अल्फ़ाज़ कागज़ों पर

उन्हें एक लंबा रास्ता तय करना पड़ता है।

हर अहसास,हर दर्द को निकलकर दिल से

दिमाग से गुजरकर क़लम में उतरना पड़ता है।

अल्फाजों के मोती कब साहिलों पर मिला करते हैं

ख्यालों के समंदर में डूब जाना पड़ता है।

हर लफ्ज़, हर नज़्म की होती है एक मंज़िल

कि पढ़ने वाले की रूह को छू जाना पड़ता है।

 मुमकिन कहां हर अल्फ़ाज़ के मुकद्दर में मंज़िल

  ना जाने कितने कारवां से उनको गुजरना पड़ता है।

सुनहरे अल्फ़ाज़ बनने की ख्वाहिश में ना जाने

हर अहसास को किस आग में झुलसना पड़ता है।

दे जाते है कभी खुशी तो कभी हौसला किसी को

दूर करने को गम गैरो के खुद इन्हें पिघलना पड़ता है।

हर अल्फ़ाज़ का अपना एक होता है अलग वजूद

जिसकी खातिर उन्हें क़लम से भी लड़ना पड़ता है।

यूं ही नहीं मिल पाती खूबसूरती हर लफ्ज को

 उन्हें मोती बन कर कागज़ पर बिखरना पड़ता है।

 पवन सोलंकी। पाली ,राजस्थान

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