साहित्य

उड़ान

शांता बाई आज फिर काम पर आई तो सात वर्षीय बेटी मालती को साथ ले आई| दो तीन दिन से सविता देख रही थी कि मालती, प्रिया के सामान को बड़े ध्यान से देखा करती उनको छूने की कोशिश करती| माँ का हाथ बंटाते बंटाते वह प्रिया का कमरा ठीक करने पहुँच जाती और एक एक सामान को छू कर देखती| आज सविता उसके पीछे पीछे प्रिया के कमरे में जा पहुँची| सविता दरवाजे पर ही ठिठक गई, मालती स्वयं ही बातें कर रही थी जब प्रिया दीदी स्कूल जाती है तो माँ मुझे स्कूल क्यों नहीं भेजती… मैं भी जब नीली स्कर्ट और सफ़ेद कमीज पहनूँगी तो अच्छी लगूँगी… बस्ते को खूब साफ रखूँगी… अच्छी पढ़ाई करूँगी… मैं तो कक्षा में सबसे आगे बैठूंगी…पर कभी टीचर जी ने मारा तो…नहीं, मैं शैतानी नहीं करूंगी…अ से अनार, आ से आम सब आता है मुझे…पूरी बीस तक गिनती भी…माँ रोज टिफिन में रोटी सब्जी रखेगी…फिर तो रोज सब्जियां खाऊँगी…रोज पूरी कॉपी भर दूँगी…पर… पर माँ रोज नई कॉपी कैसे दिलाएगी…माँ के पास तो कभी पैसे होते ही नहीं…दरवाज़े पर शांता भी सविता के साथ खड़ी हो गई| दोनों की उपस्थिति से अनजान मालती स्कूल के ही सपनों में खोई थी| सविता ने प्रिया की अलमारी से कुछ कॉपियां निकाल कर और साथ ही कुछ रूपए देते हुए शांता बाई से कहा, लो शांता अपनी बेटी के सपनों को उड़ान दो…आज ही इसका नाम स्कूल में लिखवा दो।

लेखिका – श्रीमती रश्मि चौधरी

पता   –  244 DKN स्कीम न. 74-C

            गीतांजली वाटिका के पास                       

            विजय नगर, इंदौर|

फोन –   94253515650

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