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व्यंग्य

      लॉकडाउन के मारे, ’आलू’ के सहारे

डॉ.विलास जोशी

सच बताता हूं कि  लॉकडाउन आ जाए या उसका कोई दूसरा सगा,हम भारतीय लोग हर एक अवकाश अवधि को एक’उत्सव’ के रूप में मनाने को नहीं चूकते,फिर वह अवकाश दिपावली का हो, दशहरे  का हो, कर्फ्यू का हो या कोरोना वायरस का ही क्यू  न  हो, हम गत पोैने  दो माह से अधिक समय से कोरोना वायरस  लॉकडाउन को एक उत्सव के रूप में ही मना रहे है।शायद आपको मेरी बात पर यकीन न आए ,लेकिन इस उत्सव में हमने तालियां बजाई, थालियां भी पीटी ओर दीए लगाकर रोशनी भी की। इस उत्सव का दूसरा हिरो है हमारा-’’आलू’’। यकीन मानिए, इस लॉकडाउन पिरियड में साथ निभानेके लिए आलू का जितना भी शुक्रिया अदा किया जाए, उतना  कम ही होगा।

लॉकडाउन  की लम्बी अवधि में जितना साथ आलू ने दिया उतना तो किसी ने भी नहीं दिया होगा! क्योंकि, कोरोना लॉकडाउन  की अवधि मेें यदि सहज कोईउपलब्ध  होने वाला था तो वह केवल-’’आलू’’। फिर आलू को उम्र भी बहुत मिली है। सहसा वह एकदम से खराब होता नहीं है। आलू की बात चली हैतो बता दूं कि वह एक बहुत बडे़ ’राजनीतिक पार्टी के हाईकमान’ की तरह है,जिसकी जुगलबंदी(पार्टनशिप) सबके साथ जम जाती है। मसलन, आलू के साथ बैंगन की सब्जी बनालो, आलू के साथ टमाटर की सब्जी बनालो,  ’आलू-मटर’ तो  होटलों की शान माने जाते है।फिर ’आलू-गोबी’बनालो, चाहो तो आलू-प्याज की सब्जी बनालो। आलू की सबसे बड़ी खांसियत यह है कि उसकी  अपनी स्वतंत्र पहचान भी उतनी ही बड़ी है, जितनी की उसकी किसी के साथ साझेदारी में है।फिर ’आलू कचोरी’बनालो, आलू की टिकिया बनालो। समोसा तो आलू के बिना बनता ही नहीं है।फिर ’’आलू बडे’’ के नाम में ही आलू की फितरत छीपी हैं। आलू बडे का तो हिरो ही आलू है।यानि कुल मिलाकर  ’’आलू समाजवादी’’ स्वभाव का है,जो अकेले चलने के साथ साथ  सबकों अपने साथ लेकर चलने का भी बाहुबली सामर्थ्य रखता है।

 सच बताता  हूं कि आलू स्वंयम को यह बात मालूम नहीं थी कि वह इतना गुणवान और होनकार है कि लॉकडाउन में लोगों का इतना बड़ा सहारा  बनेगा।आज देश भर के  हर एक घर  में आलू का ही बोलबाला है।जब उसने देशभर में होती अपनी इतनी इज्जत देखी तो वह भी थोड़ा बावला हो गया।

  फिर यह बात तो  जग जाहिर ही है कि अब हर जगह राजनीति और गुटबाजी चलती  है।   शायद कम लोगों को यह बात मालूम होगी कि  आलू, प्याज और बैगन में भी गुट बाजी चलती है। इनमे हर कोई अपने आप को श्रेष्ठ मानकर हार मानने के लिए तैयार नहीं रहता। सो, ऐसे ही  एक दिन ’’बैंगन’’ आलू के खिलाफ  राजनीति के मैदान में उतर गया और शर्त लगा बैठा । फिर क्या था?  थानेदार ने उन दोनों को उठाकर ’’जेल’’की कोठरी मंे डाल दिया। कुछ ही दिनों बाद’’बैंगन’’ दम तोड़कर सड़ने पर सडा़ंघ मारने लगा ,जबकि आलू  एक कोने में पड़े पड़े हंसते हुए उसके मजे देखता रहा। जब वह जीत गया तो बैंगन का घमंड  अपने आप उतर गया। एक समय ऐसा  आया कि आलू को अपने आप पर इतना भरोसा हो गया कि वह अकेला ही कोरोना वायरस के ’’लॉकडाउन पिरियड’’ को मात दे सकता है।जबआलू की महिमा अमेरिका के राष्ट्रपति  डोनाल्ड  टंªप के पास पहुुंची ता वह भी बोले-’’ मैं सोचता हूं कि ’’आलूं टिकिया’’खाने से कोरोना वायरस का खतम किया जा सकता है।वैज्ञानिक मेरी बात माने तो ’’आलू’’के रस से कोई वेक्सिन बनाए,तो चमत्कार हो सकता है’’।

 मुझे तो लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि अमेरिका के राष्ट्रपति टंªप, अब मोदीजी से ’मेलेरिया की टेबलेट’ और ’पेरा’(दवाई) की जगह  यह आदेश न  दे दे कि हमें ’’एक हजार क्विंटल आलू’’ भेजिए! और जब भारतीय आलू अमेरिका पहुंच जाएगा,तब संभव हैकि डोनाल्ट टंªप अमेरिका में यह स्कोगल चला दे-’’आलू खाओ,कोरोना वायरस को निपटाओं’’।             सच, हम भारतीय लोग ’’आलू’’ की महिमा अच्छे से जानते है,इसलिए चाहे लॉकडाउन चलता

रहे या खतम हो जाए ,हम आलू खाते है और आलू खाते ही रहेगे। बस यारो, याद रहे कि सुबह उठकर करसत  करना न भूलना। यह मेरा नहीं, बल्कि ’स्वंयम आलूजी’ का आपसे विनम्र निवेदन है।            

  डॉ.विलास जोशी ,1296/5, नंदानगर,इन्दौर

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