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अनुदान के बजाय कर्ज बांटने लगे विकसित देश


नई दिल्ली (ईएमएस)। जलवायु खतरों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने हरित कोष का गठन किया है, जिसमें विकसित देशों को 2020 तक प्रतिवर्ष सौ अरब डॉलर की राशि प्रदान करनी थी। हालांकि, विकसित राष्ट्र अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर रहे हैं। वे सहायता के नाम पर देशों को कर्ज बांट रहे हैं, जबकि अनुदान के रूप में दी जाने वाली राशि में गिरावट दर्ज की गई है। नेचर जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक यह देखा गया है कि विकसित देश वैश्विक हरित कोष में राशि प्रदान करने के बजाय सीधे दूसरे देशों को राशि देने लगे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की पड़ताल में पाया गया कि जो राशि वे सीधे देशों को दे रहे हैं, वह अधिकांश कर्ज के रूप में है, जिसे देशों को वापस लौटाना होगा, जबकि यह राशि अनुदान के रूप में दी जानी चाहिए, जिसे लौटाने की बाध्यता नहीं होती। रिपोर्ट की मानें तो विकसित देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दी जा रही सहायता राशि को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर दावे भी पेश कर रहे हैं। वे उस राशि को भी शामिल कर रहे हैं, जो आंशिक रूप से ही जलवायु खतरों के निवारण से जुड़ी है। रिपोर्ट के अनुसार विकसित देशों की ओर से दी जा रही 80 फीसदी राशि कर्ज के रूप में है। वहीं, अनुदान के रूप में दी जा रही राशि लगातार घट रही है। 2013 में 27 फीसदी राशि बतौर अनुदान दी गई थी, लेकिन 2018 के आंकड़े बताते हैं कि अनुदान का प्रतिशत महज 20 रह गया है। नेचर जर्नल में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देश जलवायु खतरों से निपटने के लिए वैश्विक हरित कोष चैनल का इस्तेमाल करने से परहेज कर रहे हैं, जो कि रियो सम्मेलन में बनी सहमति के विरुद्ध है। 1992 में हुए रियो सम्मेलन में हरित कोष पर विचार शुरू हुआ था। आर्गेनाइजेशन फॉर इकोनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) ने दावा किया है कि 2018 में विकसित देशों की ओर से करीब 80 अरब डॉलर जलवायु खतरों से निपटने के लिए दिए गए, जिसमें 62.2 करोड़ सार्वजनिक स्रोतों से और 14.6 करोड़ निजी वित्त शामिल है। 2020 में यह राशि संभवत सौ अरब डॉलर तक पहुंच गई होगी, लेकिन ऑक्सफैम की रिपोर्ट इसके उलट है। उसका कहना है कि 2017-18 में वास्तव में महज 22.5 अरब डॉलर ही विकसित देशों ने दिए हैं। इसलिए सौ अरब डॉलर का लक्ष्य अभी काफी दूर है।
अजीत झा/देवेंद्र/ईएमएस/नई दिल्ली/13/जनवरी/2021