काव्य ग़ज़ल

ठहरकर सो जाना

============= टूटकर सोने से अच्छा है थककर सो जाना स्वाभिमान के पसीने से महककर सो जाना धरती रण-क्षेत्र है, और अपराजेय योद्धा तू  संग्राम को निपटा ले फिर जमकर सो जाना काम से रोशन हो, तू भी तेरे माँ -बाप भी  सूर्य सा सारे ब्रहमांड में चमककर सो जाना अधूरी पड़ी हैं बहुत सी जरुरी […]

काव्य ग़ज़ल

~~ दो बात ~~

 कायर से मत यारी रख रिश्ते सब संस्कारी रख              उसने बातें गंदी की             तू कुछ बातें प्यारी रख। सबके बिगड़े काम बना हर बार ना तू मजबूरी रख।       सुन, यू ही महफिल में मत जा                       तू भी कुछ तैयारी रख। इस बार ना जीता तू मत डर किंतु लड़ाई तू अपनी जारी रख। अनु प्रिया  […]

काव्य ग़ज़ल

मेरा गाँव…

रंगा-पुता है शहर तुम्हारा, अनगढ़ मेरा गाँव, मिट्टी छूती,दुलराती है, पीपल देता छाँव। बतियाता है नीम और, गाती है बँसवारी, भाभी से सटकर कह जातीं, क्या ननदें क्वारी। बिटिया जितनी ही बढ़ती है, चिंता शादी की, इसी आस में टँगी हुई हैं, साँसे दादी की। लाओ जितनी लंबी चादर, पड़ती है छोटी, पता नहीं क्या […]

काव्य ग़ज़ल

बुद्धत्व

जब   किसी भी जीव से  नफ़रत ना हो और तुच्छ से तुच्छ जंतु  की हत्या का भाव  मन मे ना जगे तो समझ लो तुम बुद्ध हो गये जब  दूसरों की खुशी में  खुशी मिले और उनकी पीर भी  अपनी लगे तो समझ लो तुम बुद्ध हो गये जब   किसी दुश्मन से भी  ना हो […]

काव्य ग़ज़ल

और मैं

उठी मैं छोड़ घरकाम बैठी लिए हाथ में मोबाइल.. जी मैं जोगन बन गई जी, हा मैं जोगन बन गई जी। एक नज़र मारी वाट्स एप पे, घुसी फिर एफ. बी . में, मैं भूली सारे काम जी मैं जोगन बन गई जी…. याद न आए रिश्ते नाते बस गाउं गुणगान एफ. बी  फ्रेंड  के, […]

काव्य ग़ज़ल

तनहाई

   जब आप तनहा हों, और हों संजीदा भी, तब हर निर्जीव चीज आपकी दोस्त बन जाती हैं, आप करते हों, उससे बातें, और उन बातों को कागज पर उकेरते हो, फिर आप तनहा नहीं रहते, वे शब्द आपके हमशब्द हो जाते हैं. फिर चाहे फूल हों, तस्वीर हो,  पंछी हों, दीवारें हों,  वे सब की […]

काव्य ग़ज़ल

सलीब

कब्र में दफ़न होती लाश को खिलखिलाते सुना चिता में जलते मुर्दे को अंगड़ाई लेते देखा मुर्दे और लाश ने हैरानी से एक दूसरे को देखा परखा क्यों मिट्टी के भार में भी इतनी मुस्कराहट ? हाँ… दोस्त, ताउम्र अपने अरमानों के बोझ को ही तो ढोया है अब मिट्टी का बोझ, बोझ नहीं सुकून […]

काव्य ग़ज़ल

अपने हिस्से का सूरज

धरा बिक चुकी अब गगन बिक रहा है, हवा  बिक  रही है  चमन बिक  रहा है। विवाहों   के  इस   ख़ुशनुमा   वक़्त  में, सेहरे से  ज्यादा  कफ़न  बिक  रहा  है। है    रहनुमा    जो    हमारे    शहर   के, उन्ही की  रहम पर  अमन बिक रहा है। गज़ब  शौक  है यह  […]

काव्य ग़ज़ल

सवाल करो , सवाल करो

सवाल करो , सवाल करो अपने हक में , सवाल करो मजलूमो की पहचान बनो हक के लिए सवाल करो उठो , गिरो , लड़खड़ाओ अपने हक पर ना तरस खाओ विपरीत हो चाहे वक्त फिर भी तुम सवाल करो। कोई कितने भी सिल दे होंठ  जुबान को लहूलुहान करो रात के सन्नाटे को तोड़कर […]

काव्य ग़ज़ल

सम्बंध

“”””””” जीवन वटवृक्ष ही तो है और सम्बंध इसके   ताना-बाना है   कुछ अज़ीब-सा रिश्ता है  स्वप्न और उम्मीद के बीच  जीवन के शाश्वत सत्य का  अनुभव करता  किसी घोर तपस्वी की तरह  शांत, गंभीर और चिंतनशील  वह लगातार मुस्कुराहता  कई जीवनों का  हरता रहता है दुःख   आरम्भ से पहले  सही राह की पहचान  निराशा के   […]