काव्य ग़ज़ल

जो हुआ सो हुआ

अग्रज कानूनगो ना कम,न ज्यादा स्वादानुसार वे हो गए, होना था उन्हें शक्कर, नमक हो कर रह गए। बनने चले थे वे दीया बाती भी ना बन सके, रोशनी फूटी नहीं, तेल हो कर रह गए। भागे खूब बाजार में, भीड़ में ही खो गए, पहुंच न पाए लक्ष्य तक, अधबीच में ही टंग गए। […]

काव्य ग़ज़ल

खूबियों की जब बात चलेगी तुम सबकी निगाहों में होंगे

1.खूबियों की जब बात चलेगी तुम सबकी निगाहों में होंगेऔर हमें जमाना देखेगा भी अगर, तो तल्खियों के साथ 2.बहुत करीब आकर भी बहुत दूर हूँ तेरी रहगुजर सेहासिल होता दिखता नहीं कोई मुकाम इस सफ़र से 3.मै तेरी गली से निकला तो सरगोशियाँ निकलीकुछ तेरी उदास यादों से खामोशियां निकलीजब भी हुई उन ख़ामोशियों […]

काव्य ग़ज़ल

नववर्ष…

अबकी बार ये आँखें पीछे देखना नहीं चाहतीनहीं चाहती ये जीभबीते दिनों की दास्ताँ कहना ये हाथ बिन काम परेशान  सक्रिय होना चाहते  ये कदम चाहते हैं चलना जल्दी जल्दी निकलना इस दायरे से बाहरमन आतुर है पर भयातुर भीछोड़ने को बीस पाने को इक्कीस इस आश में विश्वास में ‘ नव-वर्ष ‘ में हटेंगेअनिश्चितताओं के साये फिर से बिखरेगी खुशियाँ चहकेंगे दिन महकेगी रातें भूलकर […]

काव्य ग़ज़ल

2020 वर्ष की वेदना

जा रहा हूं दोस्तों—– सिंह——————————————————————————————-जश्न है ना जोश है ना महफिल में कोई मदहोश है न कोई अलविदा कह रहाआज हर कोई खामोश हैना बदनीयत थी मेरी ना ही मैं बदहवास था पथ में कोरोना मिल गयाआ चिपका पिल गयाहुआ आदमी घरों में बंदमिले उसको कुछ मामूली चंदमैं पकड़ उसे धर कर रहाजो कुछ हुआ खुद पर सहा फिर भी […]

काव्य ग़ज़ल

चलो एक अखबार निकालें

:::::::::::::::::::::::::::::::::::: चलो चलें जी हम सब मिलकर एक अखबार निकालेंगे। जो खबर न कहीं जगह पाती है उसे हम इस में डालेंगे, गरीब,मजदूर,किसान,नौजवान के लिए जगह बनाएंगे। जिनके दिल की बातें दब जाती हैं उसे हम दुनिया को पढ़ाएंगे, चलो चलें जी हम सब मिलकर एक अखबार निकालेंगे। खबर लिखेगा मंगरा,पढ़ेगी बुधिया, शनिचरा से चित्र […]

काव्य ग़ज़ल

मांट्रियल

मांट्रियल  तुम हो बहुत कुछ मेरे जैसे, अधेढ होते एक युवा जैसे। तुम्हारी इमारतें कभी सुदृढ़ हुआ करती थी, मेरे मनोबल की तरह। बहुत कुछ चुरा ले गया वक्त तुमसे भी, मुझसे भी। तुम्हारा वो स्टेडियम खड़ा है एक धरोहर की तरह , जैसे मैं हूँ उपस्थित यहां बस अपने कुटुंब की शान बढ़ाता। भर […]

काव्य ग़ज़ल

: झूठ-नज़्म

  —————— मरते हुए किसान मिलेंगे रोते हुए    जवान मिलेंगे बहुत बढ़ गया देश मगर क्यों भूख और बेकारी है नेताओं का झूठ बोलना बेशर्मी से जारी है….. आज़ादी के सपने सारे फिरते हैं सब मारे-मारे चंद घराने ख़ुश हैं,बाक़ी चेहरों पर लाचारी है नेताओं का झूठ …. पिछड़े देखे,  अगड़े देखे जाति-धर्म के झगड़े […]

काव्य ग़ज़ल

हम सब एक हैं

जब हम सब अनेक एक हो जाएंगे हम  फिर  से विश्व  गुरु  कहलायेगे छोड़  धर्म   की   ये  सब झूठी बातें इंसानियत  की  राह पर चले जाएंगे हम   फिर से विश्व   गुरु  कहलाएंगे जब नर में नारायण ढूंढने लग जाएंगे मंदिर  मस्जिदों  से  बाहर  आ जाएंगे टोपी तिलक की दौड़  से आगे निकल जब  इंसानियत  का  […]

काव्य ग़ज़ल

●।।क्या खो गया ‘जीने का हक’ आज मैं।।●

धुप छांव में नित श्रम करता,तन का निर्बल,काम मन से करता,भुखमयी इस विकट विश्व में,भूख मिटे यह आशा लिये बैठा,हो गया अन्न का भिक्षु आज मैं,क्या खो गया ‘जीने का हक’ आज मैं।।घास बांस की पर्ण कुटी में,पेड़ पात्त का पात्र बना के,निर्धनता की विकट चाल में,फंसा हुआ मैं आज हूँ बैठा,हो गया दुखी आज […]

काव्य ग़ज़ल

मजदूर हूँ में,पर मजबूर नहीं।मेरी गरीबी कोई कसूर नहीं।।

था में बहुत थका हारा, बेबस लाचारी का मारा।पेट की आग के खातिर, फिरा में पग पग जग सारा।।जाने कई महलों में, मेरा बहा पसीना था।सपने बड़े दिखाकर,हमसे सब कुछ छीना था।।ना नाम मेरा,ना काम मेरा।बस केवल इस्तेमाल मेरा।।रोटी के टुकड़े के कारण,टुकड़े टुकड़े आज हुआ।भूखे चलते चलते आज, पावं से मेरे लहू बहा।।ना साधन,ना […]