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बढ़ती महंगाई चिंताजनक

डॉ. राजेश कुमार शर्मा”पुरोहित    इन दिनों महंगाई देश की सबसे बड़ी समस्या बन गई है। सुरसा के मुंह जैसी बढ़ती जा रही है। इस कमर तोड़ महंगाई के कारण लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो रही है। गरीब की थाली से प्याज गायब हो गया। रोटी प्याज से पेट भरने की […]

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व्यंग्य

व्यंग्यकार मुकेश राठौर की कलम से           *’जमाई राजा’ की गर्मी और ‘पंचरमेन’ की ठंड !*                                                                     ससुराल में दामाद रूपी जीव का बड़ा रौब होता हैं |’जमाई राजा’ और कंवर साहब जैसे भारी- भरकम सम्मानसूचक सम्बोधन इसकी गवाही देने के लिए काफी हैं कि दामाद क्या चीज़ हैं |दामाद ,’हूर संग लंगूर’ हो […]

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व्यंग्य

【व्यंग्यकार मुकेश राठौर की कलम से】 हाय राम,कपड़ों का हैं जमाना !      देश में शीतकाल के दौरान बहती गर्म हवा के बीच कपड़ों से किसी को ‘आइडेंटीफाई’ किये जाने के ‘आइडिया’ से लोगों का कपड़ें फाड़ना समझ से बाहर हैं |ऊपर से यह कहना कि ऐसा कहने वाले ख़ुद करोड़ी सूट पहनते हैं ,फ़िर […]

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ईयर T-20:बेड मॉर्निंग टू गुड मॉर्निंग !

व्यंग्य 【मुकेश राठौर】      नए साल ईयर ट्वेंटी-20 के आगमन पर देश-विदेश से ‘हैप्पी न्यू ईयर’ मनाए जाने की फ़टाफ़ट खबरें मुझ आलसी ने जब सुबह-सुबह बड़े सवेरे टीवी पर देखी तो लगा कि अपन संकल्पों की ऐसी नींद सोए कि सच में लेट हो गए | उधर दुनिया न्यू ईयर की आगवानी में रतजगा कर […]

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सुनो तो देश मुश्किल में हैं !

●व्यंग्य●        【मुकेश राठौर】                                                                                 हमारे गांव के मुंगेरी भिया जो शहर में मामा के घर रहकर पढ़े थे बता रहे थे कि इन दिनों देश मुश्किल में हैं |इत्ता मुश्किल में हैं जित्ता पेले कभी न रहा होगा !आज हर आदमी मुश्किल मे हैं |इस मुश्किल घड़ी का हम सब डटकर मुकाबला करें |मैंने कहा […]

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नए साल पर ले नया संकल्प

दिसंबर माह का अंत चल रहा है। कुछ दिनों बाद अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार नववर्ष में प्रवेश करेंगे।उसका स्वागत भी अपने – अपने अंदाज में करेंगे।शायद हर बारही अधिकतर लोग नया साल कुछ इसी तरह से मनाते हैं। कुछ लोग नए साल को नई तरीके से मनाने पर भी विश्वास रखते है। यूं तो नए […]

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खाते-पीते लोग और उनकी फिलॉसफी

व्यंग्य मुकेश राठौर                                                            बुद्धिजीवी कह गए हैं -दिया-दिलाया संग लगेगा,बचा-बचाया जंग लगेगा और खाया-पीया अंग लगेगा | जब संग कुछ नही जाना,बचे पर जंग लगना हैं तो फिर ले दे के ‘अंगवाद’ पर बात ठहर जाती हैं |और लगता हैं खाना-पीना ही जीवन निहितार्थ हैं |मैं खाते-पीते लोगों की बस्ती से आता हूँ ,जहां भगवान […]

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*जाड़े का मौसम और ‘कानर्स’ के लड्डू !

व्यंग्य  मुकेश राठौर  कहते हैं जाड़े का मौसम बड़ा गुणकारी होता हैं |सोने को लम्बी-चौड़ी रातें और जागने को छोटे-छोटे दिन | आदमी के लिये रजाई में आड़े पड़े रहकर जाड़े-चौड़े होने के लिए इससे ‘अच्छे दिन’ कोई हो ही नही सकते | सूबे-सूबे लाल बंदर टोप,केजरी गलूबन्द,मुलायम मफ़लर,इनर-स्वेटर ठस्से से डटाकर बैठों ओटले पर […]

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| मंदी के मौसम में प्याज की खेती !

|व्यंग्य   मुकेश राठौर     इन दिनों एक तरफ़ राष्ट्रव्यापी मद्दीवाड़े की ‘बोमाकुर्राट’ हैं तो दूसरी ओर तेज़ कांदे की मारा-मारी का शोर मचा हैं !अब अपने जैसे अधकचरे अर्थशास्त्र ज्ञानियों को ये नी सम्पट बैठ रही कि आख़िर देश में मंदी हैं या तेज़ी !देश समझदारों से चलता हैं ,न कि अपने जैसे डेढ़ दिमागधारियों […]

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दरिंदों के लिए हो सख्त कानून

बेटियों की अस्मत के साथ खिलवाड़ करने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जिसके लिए सख्त कानून की आवश्यकता है। भारत में बेटियों के साथ होने वाले अपराधों में तेजी से इजाफा हो रहा है। बेटियों की अस्मत के साथ खिलवाड़ करने वाले अपराधी शान से घूमते हैं। बेटियों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं […]