इंदौर

हर दिन आनंदित और प्रसन्न रहने के लिए कड़वी यादें भूलाएं, समस्याओं का सामना करें और धैर्य को बढ़ाएं –

:: कंचनबाग में राष्ट्रसंत आचार्य रत्नसुंदर म.सा. के ‘एंजॉय एवरी डे‘ पर प्रभावी प्रवचन ::
इन्दौर । हमें आगे बढ़ने से रोकने में हमारे सिवाय कोई और जिम्मेदार नहीं हैं। आनंदित और प्रसन्न रहने के लिए तमाम साधन और सुविधाएं होते हुए भी हम दुखी क्यों रहते हैं। दुख की रचना हम खुद ही करते हैं, लेकिन दोष दूसरों को देते हैं। यदि जीवन के हर पल को आनंद और खुशियों से लबालब करना है तो पुरानी कड़वी स्मृतियों को भूलना होगा, समस्याओं का सामना करना होगा और अपने धैर्य तथा संयम को बढ़ाने का अभ्यास भी करना होगा। जीवन में हमारे पास जो कुछ हैं, उसके प्रती हमारे मन में कृतज्ञता भाव भी होना चाहिए।
ये दिव्य विचार हैं राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. के जो उन्होने आज सुबह कंचनबाग स्थित नीलवर्णा पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में ‘एन्जॉय एवरी डे’ विषय पर व्यक्त किए। प्रारंभ में ट्रस्ट की ओर से हिम्म्त भाई गांधी, विजय मेहता, प्रकाश वोरा, संजय लुणिया एवं चातुर्मास आयोजन समिति की ओर से धर्मेंद्र मेहता, कल्पक गांधी, रूपेश शाह आदि ने आचार्यश्री की अगवानी की। ट्रस्ट की ओर से आचार्यश्री को कांबली भी ओढ़ाई गई। चातुर्मास समिति के कल्पक गांधी के अनुसार 5 जुलाई तक प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक कंचन बाग में आचार्यश्री के प्रवचनों की अमृत वर्षा होगी। बुधवार, 3 जुलाई को ‘टाइम मेनेजमेंट’ गुरूवार 4 जुलाई को ‘स्माईल प्लीज’ एवं शुक्रवार 5 जुलाई को ‘रॉयल लाईफ स्टाईल’ विषय पर प्रवचन होंगे।
आचार्यश्री ने कहा कि सुख और सफलता की अनुभूति तभी होगी जब हमारे अंदर सहयोगी बंधुओं, माता-पिता और जीवन में मदद करने वालों के प्रति कृतज्ञता के भाव आएंगे। असल में दुख की संरचना हम स्वयं ही करते हैं, कोई और नहीं । मुनाफा कम होता है, उसे भी घाटा मान कर हम दुख मनाने लगते हैं। इस बात पर विचार मंथन करें कि हमारे दुख का कारण आखिर क्या है, जबकि हमारे पास हर तरह की सुविधाएं मौजुद हैं। यदि वास्तव मंे प्रतिदिन एंजोय करना है तो सबसे पहले इरेज द पास्ट अर्थात पुरानी बातों को भूल जाओं। हम जितनी पुरानी कड़वी बाते याद रखेंगे, हमारी दुख उतना ही बड़ जाएगा। जहां दुर्भाव और दुर्ध्यान हो, ऐसे हर प्रसंग को भूल जाना ही ठीक रहेगा। यदि प्रसंग अच्छे हों तो उन्हे अवश्य याद रखें। जो स्मृति हमारी वृत्ति और प्रवृत्ति को प्रभावित करें उसे भूलना ही श्रेयस्कर होगा। जीवन में हमेशा वर्तमान की समस्याओं का सामना करना चाहिए। समस्या कितनी भी बड़ी हो, हमारा मन चाहे तो उसे छोटा बना सकता हैं। दूसरी ओर समस्या कितनी ही छोटी हो, मन चाहे तो उसे बहुत बड़ा भी बना सकता हैं। समस्याओं से पलायन नहीं होना चाहिए। हिमालय कभी छोटा नहीं होता और तालाब कभी समंदर नहीं बन सकता। यह हम पर निर्भर है कि हम अपनी समस्या को कितना छोटा या कितना बढ़ा मानते हैं। मन ही समस्याओं को छोटा या बढ़ा बनाता हैं। मन को ब्लाटिंग पेपर जैसा मत बनाओं जो छोटी सी स्याही की बूंद को एनलार्ज कर देता हैं। मन को ट्रेसिंग पेपर जैसा बनाओं जो बड़े को छोटा बना देता हैं। कई बार दवा के बजाया दुआ ज्यादा असर करती है। दुआ एक अदृश्य शक्ति है जिसमें बहुत ताकत होती है। जीवन में धैर्य को भी बढ़ाना जरूरी है। विश्वास रखें कि भगवान से की गई हर प्रार्थना का प्रतिफल मिलता है लेकिन हमारी इच्छा और समय से नहीं बल्कि भगवान की इच्छा और उनकी समय से मिलेगा।
उमेश/पीएम/2 जुलाई 2019

संलग्न चित्र – कंचन बाग में धर्मसभा को संबोधित करते राष्ट्रसंत पद्मविभूषण आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा.।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *