साहित्य

कितने मन के पहलू हैं, अनगिनत भाव के छंदों में…

पुस्तक  समीक्षा

वैश्वीकरण और भौगोलीकरण के इस वर्तमान युग में संचार क्रांति का प्रमुख स्थान है। आज एक क्लिक से विश्व-सम्पर्क का द्वार खुल जाता है। ब्लॉग, फ़ेसबुक, वाट्सएप, इन्स्टाग्राम, ट्विटर आदि से इलेक्ट्रॉनिक सोशल मीडिया आज अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बन चुका है। भागमभाग के इस युग में ट्विटर के छूते-छोटे त्वरित संदशों का उपयोग नेता, राजनेता, लेखक, अभिनेता से लेकर आम आदमी भी धड़ल्ले से कर रहा है। भले ही आज हम अपनों से दूर होते जा रहे हैं पर दूरियों को समेटने में सोशल मीडिया कामयाब हुआ है। आमंत्रण/निमंत्रण से लेकर फूल, बुके, खाने-पीने की वस्तुओं तक का आदान-प्रदान सोशल मीडिया पर दिन-रात चल रहा है। इसने सभी को अपनी बात रखने का पर्याप्त/असीमित स्थान उपलब्ध कराया है। इसके आ जाने से आम आदमी भी कविता, गीत, लघुकथा से लेकर आज कहानी, उपन्यास जैसी विधाओं में न केवल स्वयं को आजमा रहा है बल्कि सिद्ध भी कर रहा है। तमाम दैनिक, साहित्यिक अख़बार भी साहित्य को स्थान देकर कनिष्ठ से वरिष्ठ तक के रचनाकारों की रचना प्रकाशित कर उन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं, जिसमें ‘इंदौर समाचार’ का भी प्रमुख स्थान/योगदान है और हिन्दी साहित्य को बढ़ावा देने के इस योगदान के लिए ये सभी बहुत-बहुत धन्यवाद और बधाई के पात्र हैं।

आज हम आपको ऐसे ही एक युवा रचनाकार श्री विजय कुमार कन्नौजिया से रू-ब-रू कराने जा रहे हैं, जिन्होंने इन सुविधाओं का सकारात्मक उपयोग कर अपनी साहित्यिक सृजनशीलता को पल्लवित/पुष्पित कर उसे नए आयाम देकर एक अच्छे मुकाम तक पहुँचाने का प्रयास किया है। जब कभी भी समय मिलता है तो ये कुछ न कुछ लिखते रहते हैं। ईशकृपा से इनकी रचनाएँ कई साझा संकलनों और दैनिक/साप्ताहिक अख़बारों और मासिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। जिसका सुखद परिणाम आज हमारे समक्ष उनके कविता संग्रह ‘प्रेम अगर है, अनबन कैसी…?’ के रूप में उपस्थित है। जैसा कि पुस्तक के शीर्षक से ही स्पष्ट हो रहा है, विजय जी की कविताओं का मूल तत्व प्रेम है। प्रेम इस जीवन का मूल तत्व है। प्रेम हमें जीने के लिए नयी ऊर्जा देता है…एक बल देता है, प्रेम एक विश्वाश है…एक निस्वार्थ समर्पण है पर कभी-कभी इस असार संसार के कुछ अनुभव इन परिभाषाओं को हिला डालते हैं। विजय जी की इन कविताओं में प्रतीक्षा है, मनुहार है, शिकवा-गिला है, बनते-बिगड़ते सम्बन्ध हैं तो देखे गए मधुर सपनों का सुख और उनके बिखरने की व्यथा/पीड़ा भी दृष्टव्य है। विजय जी की इन कविताओं की, समय और स्थानाभाव की वजह से, प्रेम के विभिन्न मौसमों की कुछ झलकियाँ ही दे पा रहे हैं। सबसे पहले तो आप प्रेमी युगल की अपने प्रेम और उसके मधुर भाव को सदा बनाए रखने की ख्वाहिश पर ये पंक्तियाँ देखिए-‘नेह का ये स्नेहिल बंधन/यूँ ही सदा बनाए रखना/साथ बिताए हर्ष को यूँ ही/दिल में सदा बसाए रखना…’ और ‘हे मीत मेरे, मनमीत मेरे/मेरे जीवन के हर पथ पर/तुम साथ मेरा देते रहना/मेरे गुनगुनाते होठों पर/संगीत सदा देते रहना…’ । लेकिन अपने प्रिय के व्यवहार में ज़रा सा भी बदलाव आने पर या उसे परेशान देखकर मन चिंतित हो कह उठता है-‘बदले-बदले क्यूँ लगते हो/फिर भी अपने क्यूँ लगते हो/जो होना है होता ही है/सहमे-सहमे क्यूँ लगते हो…जीवन तो है गहरी नदिया/फिर लहरों से क्यूँ डरते हो…’ और फ़िर उसी मौसम में यह पंक्तियाँ देखिए-‘नयन आज आतुर से क्यूँ हैं? मन में कुछ हलचल सी क्यूँ है? पलकों की पंखुड़ियाँ गीली, बारिश सा ये मौसम क्यूँ है?…’ परन्तु कभी-कभी कालांतर में जब परिस्थितियोंवश जीवन में एक अजीब-सा विरह का मोड़ आता है, तब एकाकीपन के गहन अंधकार में फँसा व्यक्ति सोचता है-‘अब तो मलाल भी इस बात का है कि मलाल किससे करूँ? जब कोई साथ नहीं है पाना कहने वाला! अब तो रूठूँ तो रूठूँ किससे? जब कोई पास नहीं है मनाने वाला…’ और उस परिस्थिति में ऐसा लगता है-‘अब तो ख़यालों पर भी बंदिशों का पहरा है…’ और मन ही मन सोचता है-‘रिश्तों में सच्चाई ढूँढूँ, अपनों की परछाई ढूँढूँ/रिश्तों की जो गहराई थी/वो सब अब बदलाव लिए हैं…’ और ‘अब तो डर सा लगता है, इस प्रेम नेह के बंधन से/रिश्तों में तकनीक हो गई, अपनों से तकलीफ़ हो गई…’। लेकिन फ़िर भी उसे इसे इस बात की ख़ुशी होती है कि-‘हमने तो बस प्रीत निभाई, संबंधों की नीति निभाई/स्वार्थ भरी इस दुनिया में भी, हमने मन की रीति निभाई…’। फ़िर एक दिन अचानक बिछड़े प्रेम से मुलाकात होती है-‘उलझन ये है उलझन कैसी? प्रेम अगर है अनबन कैसी?…’ और ‘कितने वर्षों बाद मिले हो, कुछ तो हाल बयाँ कर जाओ/कुछ सुन लो कुछ कह दो अपनी/दिल को कुछ बहला तो जाओ…’। एकाएक ही सब कुछ कितना मधुर और भला लगने लगता है जीवन में एक नयी आशा का संचार होता है और समूचा माहौल खुशनुमा हो जाता है-‘आशाओं की आशा ने एक नए पंख का सृजन किया है/जो अब उड़ने को है आतुर अभिलाषा के अम्बर में…’ और ‘आज फिर से ख़याल आया है, बंद पलकों में ख़्वाब आया है/रुंधे गले की सिसकियों ने जो दस्तक दी है/अब तो आँखों का भी रोने का मन बन आया है…’। प्रेम पुन: जागृत हो उठता है और फ़िर से एक नयी उड़ान का ख़्वाब-‘चलो चलें सपने बुनते हैं/महफ़िल में अपने चुनते हैं/रिश्तों में जो कड़वाहट है/उसका समाधान करते हैं…’।

इन जैसी अन्य तमाम रोमानी कविताओं के साथ-साथ इस संग्रह की कुछ कविताएँ जीवनोपयोगी बन पड़ी हैं, यथा-‘जिंदगी के किसी भी मोड़ पर/जब हों क़दम डगमग कभी/तुम व्यथित होना नहीं/रुकना नहीं, थकना नहीं/होगा सहज फिर पथ तुम्हारा/जिंदगी के मोड़ पर…’ और ‘मन जब व्यथा से उथल-पुथल हो/तुम अपना मन व्यथित न करना/जीवन की हर पगडण्डी पर/सदा निरंतर चलते रहना…’

निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो यह संग्रह मूलत: कवि के अंतर्मन के कोने में दबे प्रेम के अहसास की व्यथा है, प्रेम में अधूरे रह गए सपनों की दस्तकें हैं, जीवन की रंगोली में भरे जाने वाले प्रेम के रंग हैं, प्रेम के रंग-बिरंगे बनते/बिगड़ते सपने हैं, जिन्हें वह शब्दों में ढालकर कविता को जन्म देते हैं। सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा में लिखी ये कविताएँ मन को भीतर तक भिंगो देती हैं और कुछ क्षणों के लिए हम उसी में खोकर रह जाते हैं। विजय जी का यह प्रथम प्रयास साहित्य जगत में अपनी सीट कन्फर्म कराने में कामयाब हुआ है। भविष्य में उत्तरोत्तर विकास करते रहने की उनको अहर्निश शुभकामनाएं देते हुए हम अपनी वाणी को उनकी कविता की इन पंक्तियों के साथ विराम देते हैं…

‘मन को मत व्यथित करो इतना/सुख-दुःख तो आनी जानी है/यूँ ही कट जाएगा जीवन/जीवन की यही निशानी है…’

इत्यलम्।

डा. सारिका मुकेश

      एम.ए. (अंग्रेजी), पीएच.डी. (अंग्रेजी)

एसोसिएट प्रोफेसर एवं हेड अंग्रेजी विभाग

वी.आई.टी. वेल्लोर-632 014 (तमिलनाडु)

मोबाइल: 81241 63491

पुस्तक- प्रेम अगर है, अनबन कैसी (कविता संग्रह)

लेखक :  विजय कन्नौजिया,प्रकाशक : विजय कन्नौजिया, जोरबाग, नई दिल्ली

मोबाइल: 9818884701

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