साहित्य

लघुकथा-

बुढिया…

`बहुत हो गया पिताजी। मैं अब उस बुढिया को ओर नहीं झेल सकता।`, इक्कीस वर्षीय समीर ने झल्लाते हुए अपने पिताजी से कहा।

– ये क्या कह रहे हो बेटा? तुम उसके क़रीब जाकर तो बेठो। उसके क़िस्से कहानियों को आत्मसात करो। फिर देखना एक दिन ऐसा आएगा जब वो तुम्हे  बहुत प्रिय लगेगी।

– लेकिन पिताजी उसके क़िस्से, कहानियां आज मेरे किसी काम के नहीं है। इस आधुनिक संसार में मैं अब उस बुढिया के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता।

– ऐसा बिलकुल भी नहीं है समीर। जिसे तुम बुढिया कह रहे हो उसके क़िस्से, कहानियां आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने की पहले हुआ करते थे।

– मैं इस बात को नहीं मानता पिताजी। आज के समय में मुझे पैसों की जरुरत है। लेकिन क्या वो बुढिया पैसे कमाने में मेरी मदद करेगी?  बोलिए।  नहीं न!

समीर के पिताजी निरुत्तर से हो जाते हैं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई उनके अस्तित्व पर चोट कर रहा है। कुछ देर बाद वे समीर को समझाते हुए कहते हैं- लेकिन बेटा पैसा ही तो सबकुछ नहीं होता है। वह हमारे देश का गौरव है। वो हमारी शान है। हमारी संस्कृति उससे जुडी हुई है।  तुम समझ रहे हो न कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ?

`पिताजी, मुझे किसी भी गौरव की नहीं पड़ी। आखिर इस देश के गौरव को मैं ही क्यों ढोऊँ? मुझे पैसे कमाने हैं और पैसे मैं उस बुढिया को साथ लेकर नहीं कमा सकता। इस लिए जा रहा हूँ किसी ओर का हाथ थामने।`, समीर ने इतना कहते हुए अपने पैर को क्रोधित होकर फ़र्श पर मारा और घर की चौखट को पार कर गया।

उसके निकलते ही भंडार गृह के एक कोने में पड़ी धूल फांकती हिन्दी रो रही थी। उसकी आँखों से टपकने वाले आंसू उस नौजवान से बस यही सवाल पूछना चाह रहे थे कि क्या अब इस देश को उसकी आवश्यकता नहीं है? क्या उसका ज्ञान अब किसी युवा को रोजगार दिलाने में सहायक नहीं है?

लेकिन अफ़सोस। हिंदी के इन सवालों के जवाब देने वाला एक ओर युवा किसी दूसरी भाषा की तलाश में घर से निकल गया।

लेखक- राजेन्द्र कुमार शास्त्री “गुरु”

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