साहित्य

शिष्टाचार!

क्या हिन्दू कॉलेज के प्रिंसिपल श्रीमान कर्र भीतर हैं?”

“जी। वे अंदर ही है।” चपरासी ने जवाब दिया।

“उनसे कहिए कि संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल ईश्वरचंद्र विद्यासागर उनसे मिलना चाहते हैं।”

“जी साहब।”

चपरासी अंदर गया और एक क्षण पश्चात बाहर आया।

“साहब आपको बुला रहे हैं।”

“ठीक है।”

विद्यासागर ने प्रवेश किया।

“नमस्कार श्रीमान!”

“आइये मिस्टर विद्यासागर।”

“मुझे आपसे कॉलेज के प्राशासनिक मुद्दों पर कुछ बात करनी थी।” विद्यासागर ने कर्र को देखा, नीला सूट पहना हुआ एक अंग्रेज़, जिसकी बात करने की शैली से ही उसके अंदर के अभिमान और दर्प दिख जाते हैं। ये अंग्रेज़ स्वयम को पता नहीं क्या समझते हैं! भारतीयों को नीचा और दोयम समझने की मानसिकता उन्हें सदैव खटकी है। लेकिन सबसे अधिक उन्हें खटक रही है इसकी बदतमीजी! अतिथि आया है, उसको कुर्सी तक के लिए नहीं पूछा! और तो और टांगें टेबल पर फैलाये हुए है, मानो किसी नौकर से बात कर रहा हो!

कर्र ने अब भी टाँगे टेबल पर फैलाईं हुईं थीं। उसके व्यवहार से स्पष्ट दिखता था कि उसके लिए संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल और बाहर खड़े चपरासी में कोई अंतर नहीं है, दोनों ही अंग्रेजों के गुलाम है!

“कहिए।” उसका स्वर धृष्ट था।

“इन दिनों कॉलेज में कर्मचारियों को लेकर समस्या आ रही है तथा पर्याप्त संख्या होने के बाद भी कार्य सही ढंग से नहीं हो पा रहा।”

“तो? कर्र ने उपेक्षापूर्ण तरीके से कहा।

“मेरा सुझाव है कि हमें कर्मचारियों को कार्य के अनुसार छोटे दलों में बाँट लेना चाहिए तथा प्रत्येक दल का दायित्व एक वरिष्ठ कर्मचारी को सौंप देना चाहिए। इससे दो चीज़ें होंगी, पहली कि कार्य सरल हो जाएगा तथा दूसरी, हम तय समय में अपने कर्मचारियों को और अच्छे से काम में लगा पाएंगे।”

“यही कहना था?”

विद्यासागर को क्रोध तो आ रहा था किन्तु अभी वे विवश थे, वे अपने से वरिष्ठ अधिकारी से बात कर रहे थे, यहाँ एक क्षण भी और रूकना उन्हें अपमान जनक लगा।

“जी।”

“आप जाइए, हम कुछ देखते हैं।”

“धन्यवाद!” विद्यासागर ने शिष्टाचार का निर्वाहन किया किन्तु कर्र को शायद शिष्टाचार का ज्ञान ही नहीं था, अथवा वह भारतीयों को शिष्टाचार के योग्य नहीं समझता था। उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

विद्यासागर कक्ष से निकल आए। उन्हें क्रोध अपने अपमान पर नहीं आ रहा था, वरन क्रोध इसलिए आ रहा था क्योंकि यह अपमान हर भारतीय का था, उन्हें दोयम और नीचा समझने वाली मनोवृत्ति का यह प्रतीक था। अंग्रेज़ भारतीयों को अपना गुलाम समझते हैं! और समझे भी क्यों न? हम भारतीय खुद ही तो गुलाम बने बैठें हैं और उसमे अपना सौभाग्य समझ रहे हैं !

इस बात को हुए एक सप्ताह हो आया था। विद्यासागर मेज पर बैठे अपने अध्ययन में व्यस्त थे।

“भैया जी।”

“हाँ काका।” इन दिनों विद्यासार के घर का काम एक प्रौढ़ वय के काका सम्हालते थे।

“कोई श्रीमान कर्र आपसे मिलने आयें हैं।”

विद्यासागर को स्मरित हो आया, पाठ्यक्रम और परीक्षा से संबन्धित कुछ बात करनी तो थी उन्हें!कल जब वे उनसे संयोगवश मिले थे तभी कर्र ने कहा था।
“उन्हें आदर सहित लाओ। और हाँ, ये सारी कुर्सियाँ ले जाइए।”
“सारी?”
“हाँ।”

काका को विद्यासागर का व्यवहार समझ नहीं आया।


कर्र ने प्रवेश किया।

विद्यासागर टेबल पर टांगें रखे बैठे हुए थे। उनके मस्तिष्क में एक उपाय आया था। देखते हैं! गरम लोहे पर हथौड़ा पड़ता है या नहीं!

“आइये श्रीमान कर्र, स्वागत है!”

कर्र ने देखा,उसके लिए न कोई कुर्सी थी और न विद्यासागर ने खड़े होकर उसका अभिवादन किया था। केवल स्वागत बोल कर वह पुन: पुस्तक पढ़ने लग गया था। और सबसे धृष्ट बात, वह उसके सामने टेबल पर पैर रखे हुए था! कर्र का अभिमान आहत सिंह की भांति दहाड़ने लगा, उसके गौर मुख पर क्रोध की लाल छाप आ गयी।

“तुम्हारी यह मजाल कि हमारे सामने ऐसे बैठो! हम साहब लोग और कहाँ तुम गंवार हिन्दुस्तानी! अपनी औकात भूल गए हो तो वह भी याद दिलाऊँ? हमारे सामने ऐसे मेज पर टांग फैलाये बैठते हो मूर्ख! क्या तुम्हें याद नहीं कि कौन मालिक है और कौन नौकर?” कर्र आग बबूला हुए जा रहा था।

“क्या हुआ कर्र साहब? विद्यासागर ऐसे बोले मानो उन्हें समझ ही नहीं आया हो। “मैंने ऐसा क्या कर दिया? उस दिन आप ऑफिस में ऐसे ही बैठे हुए थे, अब हम ठेठ गंवार, तो हमें लगा कि सभ्य समाज में यही शिष्टाचार होता होगा। अब शिष्टाचार हम आप साहब लोगों से ही तो सीखेंगे। तो सोचा कि आप का अनुकरण कर हम भी सभ्य बन जाएँ। मैंने कुछ गलत किया क्या मिस्टर कर्र? काका, ज़रा श्रीमान के लिए मिष्टि तो लाओ।

कर्र के मुंह से शब्द नहीं निकले। वह लज्जित हो गया था। इस विद्यासागर ने कितनी आसानी से उसे गलत कर दिया, उसका सिर झुका दिया। उसके क्रोध के स्थान पर लज्जा आ गयी थी, मानो बीच सड़क पर किसी ने तमाचा दे मारा हो। उसका मुख पहले क्रोध से लाल था, और अब शर्म से लाल हो गया था।काका एक थाल लेकर आए। उनको विश्वास न हुआ! साहब खड़े थे और भैया जी साहबों की तरह बैठे थे। यह कैसे हो सकता है! अगर गोरे साहब गुस्सा हो गए तो?

“आओ काका, व्यंजन यहाँ रख दो। और साहब के लिए एक कुर्सी तो लाओ।”

काका कुर्सी लेकर आए।

“धन्यवाद काका, बैठिए मिस्टर कर्र। आपको अवश्य ही महत्वपूर्ण बात करनी थी। “

“बात तो अब कल ऑफिस में करेंगे मिस्टर विद्यासागर , अभी तो जो सीख आपने दी है, वही लेकर जा रहा हूँ।”

“अरे! अरे! आप तो बुरा मान गए।”

“नहीं मिस्टर विद्यासागर, आज समझ आ गया कि चाहे अंग्रेज़ हो या हिन्दुस्तानी, सबका स्वाभिमान होता है जिसका हमें सम्मान करना चाहिए। अंग्रेज़ भारतीयों के साथ जो दुर्व्यवहार करते हैं, वह पूरी तरह गलत है। मै शर्मिंदा हूँ कि उस दिन आपके साथ मैंने गलत व्यवहार किया और माफी मांगता हूँ । उम्मीद करता हूँ कि आप समझेंगे।”

“माफी की कोई आवश्यकता नहीं है श्रीमान और न मेरा आपको अपमानित करने का उद्देश्य था। खुशी है कि आप वह समझ गए जो मैंने कहना चाहा था। अपने अनुचित व्यवहार के लिए क्षमा चाहता हूँ।”

“आपसे परिचय पाकर अच्छा लगा। कल ऑफिस में इत्मीनान से बात करेंगे।” कर्र ने हाथ आगे बढ़ाया और विद्यासागर ने दोनों हाथों से उससे हाथ मिलाया। कर्र चला गया, वे उसे बाहर तक छोडने गए।

“भैया जी।”

“हाँ काका।”

“आपने गोरे साहब के साथ…”

“सोच रहे होंगे की मैंने ऐसा क्यों किया?मै बताता हूँ। ये अंग्रेज़ हम भारतीयों को अपने से नीचा मानते हैं और हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं, हमें सम्मान नहीं देते। इन महोदय ने एक दिन दफ्तर में मेरे साथ ऐसा किया। मुझे बुरा अपने अपमान का नहीं लगा, अपितु इस विचार से लगा जो ये अंग्रेज़ लोग मानते आए हैं कि हम भारतीय असभ्य और गँवार हैं, और हम समान व्यवहार के अधिकारी नहीं। यह मेरा नहीं , भारतीयों का अपमान था, जो प्रतिदिन इन दफ्तरों में होता है। सवाल मेरे अहम का नहीं, हम सबके स्वाभिमान का था, राष्ट्रीय स्वाभिमान का । इसलिए मैंने उसके साथ ऐसा किया। और इसको यह उत्तर ही नहीं, एक सीख भी मिली है कि किसी के आत्म-सम्मान को कभी कमतर आंक कर उसको ठेस नहीं पहुंचानी चाहिए। आगे से यह ऐसा किसी भारतीय के साथ करने का साहस नहीं करेगा। “

“तुम्हारे विचार कितने बड़े हैं, भैया जी !”

“खैर छोड़ो, मुझे भी सीखने को मिला।”

“क्या?” काका विस्मित हुए।

“कि यह शिष्टाचार नहीं होता।” विद्यासागर हँसते हुए बोले।

-क्षितिज जैन

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