काव्य ग़ज़ल

पंख कुतर दिए

वो अधमरा सा व्यक्ति कब्र में लटके जिसके पाव थे

एक नन्ही सी बिटियाँ को उसने दिए कितने घाव थे

अरे दुष्ट, पापी, दुराचारी तुजे जरा भी शर्म ना आयी।

कुकर्मी करने से पहले तुजे तेरी बेटी याद ना आई।

छोटी की इज्जत के तूने टुकड़े टुकड़े कर दिए

अभी उड़ना सीखा भी नही औऱ तूने पंख कुतर दिए

वो चीखी, चिल्लाई, घबराई, सब कुछ व्यर्थ हो गया।

पल भर में इतज्जत, आबरू सब कुछ खो गया

उमेश राठौड़

वार्ड न. 1 सिलावद रोड़ पलसूद

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