काव्य ग़ज़ल

बाल दिवस मना रहे

ये लोग कैसा बाल दिवस मना रहे।

 हम तो अपना बचपन भुला रहे।

झूठन उठता झूठन खाता ।

जिन हाथों में थामनी थी कलम।

आज झाड़ू चला रहे ।

बचपन पिसा रहे ।

ये लोग  कैसा बाल दिवस मना रहे।

हम तो अपना  बचपन  भुला रहे।

  हाथों में न कोई है  किताब।

इनके हाथों लगी ये भट्टी की राख।

बर्तनों  को घिसते घिसते हाथ ।

हाथों की लकीरें मिट गयी ।

मिट गये सारे ज़बात ।

ये लोग कैसा बाल दिवस मना रहे।

हम तो अपना बचपन  भुला रहे

देखा बहुत लोगों ने पूछी न कुशलात ।

क्यूं मेरे नाजुक हाथों ने पकड़ी न किताब।

काल के गाल में मां-बाप चले गये।

यही है मेरे जीवन का संताप ।

अभी तक न मिले जो थामते मेरा हाथ ।

ये लोग कैसा बाल दिवस मना रहे।

हम तोअपना बचपन भुला रहे। ।

न माँ की गोद मिली न बाबा का कंधा

आकाश की चदरिया धरती का  बिछोना ।

न हाथों में कोई खिलोना इसी का हे रोना।

खिलोना नहीं टूटा टुटे हैं हम।

ये लोग कैसा बाल दिवस मना रहे।

हम तोअपना बचपन भुला रहे। ।

अर्विना

D9सृजनविहार एन टी पी सी मेजा‌

जिला प्रयागराज पोस्ट कोडहर

पिनकोड 212301

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