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मराठा कोटे से टूटेगी 50 फीसदी आरक्षण की सीमा

फिर छिड़ेगा गुर्जर और जाट आरक्षण का मुद्दा
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से मराठा आरक्षण को मंजूरी दिए जाने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर भी सवाल खड़े हो गए हैं, जिसमें उसने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तक तय की थी। मराठाओं को नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 16 फीसदी रिजर्वेशन को मंजूरी के साथ ही सूबे में आरक्षण 70 फीसदी तक हो जाएगा। महाराष्ट्र हाई कोर्ट की जस्टिस रंजीत मोरे और भारती डांगरे की पीठ ने मराठा आरक्षण को संवैधानिक तौर पर वैध करार दिया है। यह मुद्दा सूबे में लंबे समय से विवाद और बहस का विषय रहा है। हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकार से 16 फीसदी रिजर्वेशन की बजाय इसे शिक्षा में 12 फीसदी और नौकरियों में 13 फीसदी तक करने का सुझाव दिया है। आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण के साथ ही महाराष्ट्र में आरक्षण 70 फीसदी तक पहुंच गया है। इस आदेश से अब आरक्षण को लेकर नई चीजें सामने आ सकती हैं।
गौरतलब है ‎कि सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण के लिए 50 फीसदी की सीमा तय की थी। इस लिहाज से हाई कोर्ट का फैसला अहम है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने जातिगत आरक्षण के लिए 50 फीसदी की लिमिट तय की थी। इस फैसले के बाद कई अन्य राज्यों में भी आरक्षण को लेकर एक बार फिर पहल हो सकती है। राजस्थान सरकार एक बार फिर से गुर्जर कोटा की पहल कर सकती है और हरियाणा में इसी तरह जाट आरक्षण का मुद्दा फिर जिंदा हो सकता है। बता दें कि इन दोनों ही कोशिशों को अदालत ने खारिज कर दिया था।
मराठा आरक्षण को मंजूरी देते हुए कोर्ट ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में 50 फीसदी कोटे की इस सीमा को पार किया जा सकता है। हमें लगता है कि जस्टिस एम.बी गायकवाड़ आयोग ऐसा दिखाने में सफल रहा है। मराठा कोटे को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि बैकवर्ड क्लास कमिशन ने अपनी रिपोर्ट में यह साबित किया है कि मराठा सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हैं। इसके अलावा सरकारी नौकरियों में भी उनका प्रतिनिधित्व कम है। मराठा रिजर्वेशन को चुनौती देने वाले संजीव शुक्ला ने कहा‎ ‎कि हम इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
सतीश मोरे/28जून

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